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________________ ३३२] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १,९-९, १५८ मणुसेसु गच्छंता गब्भोवतंतिएसु गच्छंति, णो सम्मुच्छिमेसु ॥ १५८ ॥ मनुष्योंमें जाते हुए वे गर्भजोमें जाते हैं, सम्मूर्च्छनोंमें नहीं जाते ॥ १५८ ।। गब्भोवतंतिएसु गच्छंता पज्जत्तएसु गच्छंति, णो अपज्जत्तएसु ॥ १५९ ॥ गर्भजोमें जाते हुए वे पर्याप्तकोंमें जाते हैं, अपर्याप्तकोंमें नहीं जाते ॥ १५९ ॥ पजत्तएसु गच्छंता संखेजवासाउएसु वि गच्छंति असंखेजवासाउएसु वि गच्छंति ॥ पर्याप्तकोंमें जाते हुए वे संख्यातवर्षायुष्क मनुष्योंमें भी जाते हैं और असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्योंमें भी जाते हैं ॥ १६० ॥ देवेसु गच्छंता भवणवासियप्पहुडि जाव णवगेवजविमाणवासियदेवेसु गच्छंति ॥ देवोंमें जाते हुए वे भवनवासी देवोंसे लगाकर नौ ग्रैवेयक विमानवासी देवों तक जाते हैं । मणुसा सम्मामिच्छाइट्ठी संखेज्जवासाउआ सम्मामिच्छत्तगुणेण मणुसा मणुसेहि णो कालं करेंति ॥ १६२ ॥ संख्यात वर्षकी आयुवाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि मनुष्य सम्यग्मिथ्यात्व गुणस्थानके साथ मनुष्य होते हुए मनुष्य पर्यायके साथ मरण नहीं करते हैं ॥ १६२ ॥ मणुससम्माइट्ठी संखेज्जवासाउआ मणुस्सा मणुस्सेहि कालगदसमाणा कदि गदिओ गच्छंति ? ॥ १६३ ॥ मनुष्य सम्यग्दृष्टि संख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्य पर्यायके साथ मरण करके कितनी गतियोंमें जाते हैं ? ॥ १६३ ॥ एकं हि चेव देवगदिं गच्छति ॥ १६४ ॥ उक्त संख्यातवर्षायुष्क सम्यग्दृष्टि मनुष्य एक मात्र देवगतिको ही जाते हैं ॥ १६४ ॥ देवेसु गच्छंता सोहम्मीसाणप्पहुडि जाव सबट्ठसिद्धिविमाणवासियदेवेसु गच्छंति ॥ देवोंमें जाते हुए वे सौधर्म-ऐशानसे लगाकर सर्वार्थसिद्धित्रिमानवासी देवों तकमें जाते हैं । मणुसा मिच्छाइट्ठी सासणसम्माइट्ठी असंखज्जवासाउआ मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ? ॥१६६ ॥ मनुष्य मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्य पर्यायके साथ मर करके कितनी गतियोंमें जाते हैं ? ॥ १६६ ॥ एकं हि चेव देवगदि गच्छंति ॥ १६७॥ उपर्युक्त मनुष्य एक मात्र देवगतिको ही जाते हैं ॥ १६७ ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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