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________________ ३३०] छक्खंडागमे जीवाणं [१,९-९, १३८ तिरिक्खा असंजदसम्माइट्ठी असंखेज्जवासाउआ तिरिक्खा तिरिक्खेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ? ॥ १३८ ॥ तिथंच असंयतसम्यग्दृष्टि असंख्यातवर्षायुष्क तिर्यंच जीव तियंच पर्यायके साथ मर करके कितनी गतियोंमें जाते हैं ? ॥ १३८ ॥ एकं हि. चेव देवगदिं गच्छंति ॥ १३९ ॥ असंख्यातवर्षायुष्क असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच मरणको प्राप्त होकर एक मात्र देवगतिको ही जाते हैं ॥ १३९ ॥ देवेसु गच्छंता सोहम्मीसाणकप्पवासियदेवेसु गच्छंति ॥ १४०॥ देवोंमें जाते हुए वे असंख्यातवर्षायुष्क असंयतसम्यग्दृष्टि तिर्यंच सौधर्म-ऐशान कल्पवासी देवोंमें जाते हैं ॥ १४० ॥ मणुसा मणुसपज्जत्ता मिच्छाइट्ठी संखेज्जवासाउआ मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ? ॥ १४१ ॥ मनुष्य और मनुष्य पर्याप्त मिथ्यादृष्टि संख्यातवर्षायुष्क मनुष्य मनुष्य पर्यायके साथ मरकर कितनी गतियोंको जाते हैं ? ॥ १४१॥ चत्तारि गदीओ गच्छंति-णिरयगई तिरिक्खगई मणुसगई देवगई चेदि ॥१४२॥ उपर्युक्त मनुष्य नरकगति, तिर्यंचगति, मनुष्यगति और देवगति इन चारों ही गतियोंमें जाते हैं ॥ १४२ ॥ णिरएसु गच्छंता सव्वणिरएसु गच्छंति ।। १४३ ॥ नरकोंमें जानेवाले उपर्युक्त मनुष्य सभी नरकोंमें जाते हैं ॥ १४३ ॥ तिरिक्खेसु गच्छंता सव्यतिरिक्खेसु गच्छंति ॥ १४४ ।। तिर्यंचोंमें जाते हुए वे सभी तिर्यंचोंमें जाते हैं ॥ १४४ ॥ मणुसेसु गच्छंता सव्वमणुस्सेसु गच्छंति ।। १४५ ॥ मनुष्योंमें जाते हुए वे सभी मनुष्योंमें जाते हैं ॥ १४५ ॥ देवेसु गच्छंता भवणवासियप्पहुडि जाव णवगेवज्जविमाणवासियदेवेसु गच्छंति ॥ देयोंमें जाते हुए वे भवनवासी देवोंसे लगाकर नववेयक तकके विमानवासी देवोंमें जाते हैं ।। मणुसा अपज्जत्ता मणुसा मणुसेहि कालगदसमाणा कदि गदीओ गच्छंति ? ॥१४७ मनुष्य अपर्याप्तक मनुष्य मनुष्य पर्यायके साथ मर करके कितनी गतियोंमें जाते हैं ? | दुवे गदीओ गच्छंति तिरिक्खगदि मणुसगदिं चेव ॥ १४८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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