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________________ १,९-६, ४१] जीवट्ठाण-चूलियाए उकस्सट्ठिदिपरूपणा [३०५ आवाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसेओ ॥ ३२ ॥ उक्त कर्मोकी आबाधाकालसे हीन कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है ॥३२॥ आहारसरीर-आहारसरीरंगोवंग-तित्थयरणामाणमुक्कस्सगो विदिबंधो अंतोकोडाकोडीए ॥ ३३ ॥ __ आहारकशरीर, आहारकशरीरांगोपांग और तीर्थंकर नामकर्म इन प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अन्तःकोडाकोडि सागरोपम मात्र होता है ॥ ३३ ॥ अंतोमुहुत्तमाबाधा ॥ ३४ ॥ पूर्वोक्त आहारकशरीरादि प्रकृतियोंका आबाधाकाल अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ ३४ ॥ आवाधूणिया कम्मद्विदी कम्मणिसेगो ॥ ३५ ॥ उक्त तीन कर्मोकी आबाधाकालसे हीन कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है ॥ णग्गोधपरिमंडलसंठाण-वज्जणारायणसंघडणणामाणं उक्कस्सगो द्विदिबंधो वारस . सागरोवमकोडाकोडीओ ॥ ३६॥ न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वज्रनाराचसंहनन इन दोनों नामकर्मोका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बारह कोडाकोडि सागरोपम मात्र होता है ॥ ३६ ॥ वारस वाससदाणि आबाधा ॥३७॥ न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और वज्रनाराचसंहनन इन दोनों प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अबाधाकाल बारह सौ वर्ष मात्र होता है ॥ ३७॥ आवाधूणिया कम्मद्विदी कम्मणिसेगो ॥ ३८ ॥ उक्त दोनों कर्मोकी आबाधाकालसे हीन कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है । सादियसंठाण-णारायणसंघडणणामाणमुक्कस्सओ द्विदिबंधो चोदससागरोवमकोडाकोडीओ ॥ ३९ ॥ स्वातिसंस्थान और नाराचसंहनन इन दोनों नामकर्मोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध चौदह कोडाकोडि सागरोपम मात्र होता है ॥ ३९ ॥ चोदस वाससदाणि आबाधा ॥ ४० ॥ उक्त दोनों कर्मोका उत्कृष्ट आबाधाकाल चौदह सौ वर्ष मात्र होता है ॥ ४० ॥ आवाधूणिया कम्मट्ठिदी कम्मणिसओ ॥४१॥ खातिसंस्थान और नाराचसंहनन इन दोनों नामकर्मोकी आबाधाकालसे हीन कर्मस्थिति प्रमाण उनका कर्मनिषेक होता है ॥ ४१ ।। छ. ३९ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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