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________________ २९६ ] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १, ९-२, १०६ वह प्रथम अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्मसे संयुक्त देवगतिको बांधनेवाले अप्रमत्तसंयत और अपूर्वकरणसंयतके होता है ॥ १०५॥ तत्थ इमं विदियअट्ठावीसाए द्वाणं- देवगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय-तेजाकम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउब्वियसरीरअंगोवंगं वण्ण-गंध-रस-फासं देवगदिपाओग्गाणुपुब्बी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सासं पसत्थविहायगदी तस-बादर-पज्जत्तपत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुभासुभाणमेक्कदरं सुभग-सुस्सर-आदेज्जं जसकित्तिअजसकित्तीणमेक्कदरं णिमिणं, एदासिं विदियअट्ठावीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव हाणं ।। नामकर्मके देवगति सम्बन्धी उक्त पांच बन्धस्थानोंमें यह द्वितीय अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थान है- देवगति, पंचेन्द्रिय जाति, वैक्रियिकशरीर, तैजसशरीर कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, वैक्रियिकशरीरअंगोपांग वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, देवगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर और अस्थिर इन दोनों से कोई एक, शुभ और अशुभ इन दोनों से कोई एक, सुभग सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति और अयशःकीर्ति इन दोनोंमेंसे कोई एक और निर्माण नामकर्म; इन द्वितीय अट्ठाईस प्रकृतियोंका एक ही भावमें अवस्थान है ॥ १०६ ॥ ___ यहांपर स्थिर, शुभ और यश कीर्ति इन तीन युगलोंके विकल्पसे (२४२४२८) आठ भंग होते हैं। देवगदिं पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिद्विस्स वा सासणसम्मादिहिस्स वा सम्मामिच्छादिहिस्स वा असंजदसम्मादिहिस्स वा संजदासंजदस्स वा संजदस्स वा ॥ १०७ ॥ वह द्वितीय अट्ठाईसप्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रिय जाति और पर्याप्त नामकर्मसे संयुक्त देवगतिको बांधनेवाले मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि, संयतासंयत और संयतके होता है । १०७ ॥ यहां संयत पदसे एक मात्र प्रमत्तसंयतका ग्रहण करना चाहिए, क्योंकि, उपरिम गुणस्थानवर्ती संयत जीवोंके अस्थिर, अशुभ और अयशःकीर्ति इन प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता है। तत्थ इमं एकिस्से द्वाणं- जसकित्तिणामं । एदिस्से पयडीए एकम्हि चेव द्वाणं । नामकर्मके देवगति सम्बन्धी उक्त पांच बन्धस्थानोंमें यशःकीर्ति नामकर्म सम्बन्धी यह एक प्रकृतिक बन्धस्थान है। इस एकप्रकृतिक बन्धस्थानका एक ही भावमें अवस्थान है ॥ १०८ ॥ बंधमाणस्स तं संजदस्स ॥ १०९ ॥ वह एकप्रकृतिक बन्धस्थान उसी एक यश कीर्ति प्रकृतिको बांधनेवाले संयतके होता है ।। Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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