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________________ प्रस्तावना [२९ मिथ्यादृष्टि जीव अपहृत नहीं होते , अर्थात् उससे अधिक हैं। यहां अपहृतका अभिप्राय ऐसा समझना चाहिए कि एक ओर मिथ्यादृष्टि जीवोंकी राशिको रखा जाय और दूसरी ओर भूतकालमें जितनी अनन्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी बीत गई हैं, उनके समयोंका ढेर रखा जावे । पुनः मिथ्यादृष्टि जीवराशिमेंसे एक जीव और अतीत कालके समयोंमेंसे एक समयको साथ साथ निकालकर कम करे । इस प्रकार उत्तरोत्तर कम कम करते हुए अतीत कालके समस्त समय तो समाप्त हो जाते हैं, किन्तु मिथ्यादृष्टि जीवराशि समाप्त नहीं होती है। यदि इतनेपर भी जिज्ञासुकी जिज्ञासा उसके और भी स्पष्ट रूपसे प्रमाण जाननेकी बनी रही तो उसके स्पष्टीकरणके लिए आचार्यने क्षेत्रप्ररूपणाका आश्रय लेकर उत्तर दिया कि अनन्तानन्त लोकोंके जितने आकाशप्रदेश हैं, उतने मिथ्यादृष्टि जीव हैं। इस प्रकार द्रव्य, काल और क्षेत्र प्रमाणोंके द्वारा मिथ्यादृष्टि जीवोंकी यथार्थ संख्याको जाननेका ही नाम भावप्रमाण है । दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें गुणस्थानवी जीवोंका प्रमाण यद्यपि सामान्यसे पल्योपमके असंख्यातवे भाग बतलाया है, तथापि उनके प्रमाणमें हीनाधिकता है । तदनुसार पांचवें गुणस्थानवाले जीवोंकी जितनी संख्या है, उससे दूसरे गुणस्थानवाले जीव अधिक है, उनसे तीसरे गुणस्थानवाले जीव अधिक है और उससे भी चौथे गुणस्थानवाले जीव अधिक हैं। छठे गुणस्थानवाले जीवोका प्रमाण सूत्रकारने यद्यपि कोटिपृथकत्व कहा है, पर धवलाकारने गुरुपरंपराके उपदेशानुसार पांच करोड़ तेरानवै लाख अट्ठानवै हजार दो सौ छह (५९३९८२०६ ) बतलाया है। सातवें गुणस्थानका प्रमाण सूत्रकारने यद्यपि संख्यात ही बतलाया है, तथापि धवलाकारने उसका अर्थ कोटि पृथक्त्वसे नीचेकी ही राशिको ग्रहण करनेका व्यक्त किया है और गुरुपदेशके अनुसार दो करोड़ छयानवे लाख निन्यानवें हजार एक सौ तीन ( २९६९९१०३ ) बतलाया है । अर्थात् यतः छठे गुणस्थानसे सातवें गुणस्थानका काल आधा है, अतः उसके जीवोंकी संख्या भी छठेकी अपेक्षा आधी है। इससे ऊपर उपशमश्रेणी और क्षपकश्रेणीमें जीवोंकी संख्या सूत्रकारने प्रवेशकी अपेक्षा एक, दो, तीन को आदि लेकर क्रमशः ५४ और १०८ बतलाई गई है और दोनों श्रेणियों के कालकी अपेक्षा प्रत्येक गुणस्थानमें संख्यात बतलाई है, तथापि धवलाकारने बहुत से आचार्योंके मतोंका उल्लेखकर सबसे अन्तमें दी हुई गाथाके मतको प्रधानता देकर उपशम श्रेणीके प्रत्येक गुणस्थान में संचित जीवोंकी संख्या २९९ और क्षपक श्रेणीके प्रत्येक गुणस्थानमें संचित जीवोंकी संख्या ५८८ बतलाई है। तदनुसार उपशम और क्षपकश्रेणी-सम्बन्धी आठवें, नववें और दशवें गुणस्थानमें प्रत्येककी जीवसंख्या ८९७ - ८९७ जानना चाहिए। ग्यारहवेंकी जीवसंख्या २९९ और बारहवें गुणस्थानकी जीवसंख्या ५९८ बतलाई गई है। तेरहवें गुणस्थानमें प्रवेशकी अपेक्षा एक, दो, तीनको आदि लेकर एक सौ आठ बतलाई गई है और तेरहवें गुणस्थानमें संचित होनेवाले सर्व सयोगिकेवली जिनोंका प्रमाण सूत्रकारने शतसहस्रपृथक्त्व बतलाया है, जिसका अर्थ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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