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१, ९-२, ९६ ]
जीवाण - चूलियाए द्वाणसमुक्कित्तणं
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कोई एक और निर्माण नामकर्म; इन तृतीय उनतीस प्रकृतियोंका एक ही भावमें अवस्थान है ॥९१॥ यहां छह संस्थान, छह संहनन और दो विहायोगति आदि सप्रतिपक्ष प्रकृतियोंके चार हजार छह सौ आठ ( ६६x२x२x२x२x२x२x२=४६०८ ) भंग होते हैं । मणुस गर्दि पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स ।। ९२ ॥
यह तृतीय उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान, पंचेन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्मसे संयुक्त मनुष्यगतिको बांधनेवाले मिथ्यादृष्टि जीवके होता है ॥ ९२ ॥
तत्थ इमं पणुवीसाए द्वाणं- मणुसगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजा कम्मइयसरीरं हुंडठाणं ओरालियसरीर अंगोवंगं असंपत्त सेवट्टसंघडणं वण्ण-गंध-रस- फासं मणुसगदिपाओग्गाणुपुत्री अगुरुअलहुअ - उवघाद-तस - बादर - अपज्जत्त - पत्ते यसरीर - अथिर-असुभ - दुभगअणादेज्ज- अजसकित्तिणिमिणं, एदासिं पणुवीसाए पयडीणमेक्कम्हि चैव द्वाणं ॥ ९३ ॥
नामकर्मके मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानोंमें यह पच्चीसप्रकृतिक बन्धस्थान है-मनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, हुण्डसंस्थान, औदारिकशरीरअंगोपांग, असंप्राप्तासृपाटिकासंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलघु, उपघात, त्रस, बादर, अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, अनादेय, अयशः कीर्ति और निर्माण नामकर्म; इन पच्चीस प्रकृतियोंका एक ही भावमें अवस्थान है ।। ९३ ॥
मणुसगदिं पंचिंदियजादि - अपज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं मिच्छादिट्ठिस्स ॥ ९४॥ वह पच्चीसप्रकृतिक बन्धस्थान, पंचेन्द्रियजाति और अपर्याप्त नामकर्मसे संयुक्त मनुष्यगतिको बांधनेवाले मिथ्यादृष्टिके होता है ॥ ९४ ॥
देवदिणामाए पंच द्वाणाणि - एक्कत्तीसाए तीसाए एगुणतीसार अडवीसाए एक्स्सेि द्वाणं चेदि ॥ ९५ ॥
देवगति नामकर्मके पांच बन्धस्थान हैं- इकतीसप्रकृतिक, तीसप्रकृतिक, उनतीसप्रकृतिक, अट्ठाईसप्रकृतिक और एकप्रकृतिक बन्धस्थान ॥ ९५ ॥
तत्थ इमं एक्कत्तीसाए द्वाणं- देवगदी पंचिंदियजादी वेउव्विय- आहार-तेजाकम्मइयसरीरं समचउरससंठाणं वेउव्त्रिय- आहार अंगोवंगं वण्ण-गंध-रस - फासं देवगदिपाओगावी अगुरुअलहुअ - उवघाद - परघाद - उस्सासं पसत्थविहायगदी तस - बादर - पज्जत्त- पत्तेयसरीर-थर-सह- सुभग-सुस्सर-आदेज-जसकित्तिणिमिण - तित्थयरं, एदासिमेकत्ती साए पयडीणhere चेव द्वाणं ॥ ९६ ॥
नामकर्मके देवगति सम्बन्धी उक्त पांच बन्धस्थानोंमें यह इकतीसप्रकृतिक बन्धस्थान हैदेवगति, पंचेन्द्रियजाति, वैक्रियिकशरीर, आहारकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान,
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