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________________ १, ९-२, ८९] जीवट्ठाण-चूलियाए हाणसमुक्त्तिणं [ २९१ समचतुरससंठाणं ओरालियसरीरअंगोवंगं वज्जरिसहसंघडणं वण्ण-गंध-रस-फासं मणुसगदिपाओग्गाणुपुवी अगुरुअलहुअ-उवघाद-परघाद-उस्सास-पसत्थविहायगदी तस-चादर-पज्जत्तपत्तेयसरीरं थिराथिराणमेक्कदरं सुहासुहाणमेक्कदरं सुभग-सुस्सर-आदेज्जं जसकित्तिअजसकित्तीणमेक्कदरं निमिणं तित्थयरं, एदासिं तीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव हाणं ॥८५॥ ___ नामकर्मके मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानोंमें यह तीसप्रकृतिक बन्धस्थान हैमनुष्यगति, पंचेन्द्रियजाति, औदारिकशरीर, तैजसशरीर, कार्मणशरीर, समचतुरस्रसंस्थान, औदारिकशरीरांगोपांग, वज्रवृषभनाराचसंहनन, वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूर्वी, अगुरुअलधु, उपघात, परघात, उच्छ्वास, प्रशस्त विहायोगति, त्रस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर और अस्थिर इन दोनों से कोई एक, शुभ और अशुभ इन दोनोंमेंसे कोई एक, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति और अयशःकीर्ति इन दोनोंमेंसे कोई एक, निर्माण और तीर्थंकर नामकर्म; इन तीस प्रकृतियोंका एक ही भावमें अवस्थान है ।। ८५ ॥ ___यहां स्थिर-अस्थिर, शुभ-अशुभ और यशःकीर्ति-अयशःकीर्ति इन सप्रतिपक्ष प्रकृतियोंके विकल्पसे आठ (२४२४२=८ ) भंग होते हैं। मणुसगदिं पंचिंदिय-तित्थयरसंजुत्तं बंधमाणस्स तं असंजदसम्मादिहिस्स ॥८६॥ वह तीसप्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रियजाति और तीर्थंकर प्रकृतिसे संयुक्त मनुष्यगतिको बांधनेवाले असंयतसम्यग्दृष्टिके होता है ॥ ८६ ॥ तत्थ इमं पढमएगूणतीसाए हाणं जथा तीसाए भंगो, णवरि विसेसो तित्थयरं वज्ज । एदासिं पढमएगूणतीसाए पयडीणमेक्कम्हि चेव द्वाणं ॥ ८७ ॥ नामकर्मके मनुष्यगति सम्बन्धी उक्त तीन बन्धस्थानोंमें यह प्रथम उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान है जो तीसप्रकृतिक बन्धस्थानके समान प्रकृतिभंगवाला है। विशेषता यह है कि यहां तीर्थंकर प्रकृतिको छोड़ देना चाहिए । इन प्रथम उनतीस प्रकृतियोंका एक ही भावमें अवस्थान है ॥ ८७ ।। मणुसगदि पंचिंदिय-पज्जत्तसंजुत्तं बंधमाणस्स तं सम्मामिच्छादिहिस्स वा असंजदसम्मादिहिस्स वा ॥ ८८ ॥ वह प्रथम उनतीसप्रकृतिक बन्धस्थान पंचेन्द्रियजाति और पर्याप्त नामकर्मसे संयुक्त मनुष्यगतिको बांधनेवाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टिके होता है ।। ८८ ॥ ___ तत्थ इमं विदियएगूणतीसाए हाणं- मणुसगदी पंचिंदियजादी ओरालिय-तेजाकम्मइयसरीरं हुंडसंठाणं वज्ज पंचण्हं संठाणाणमेक्कदरं ओरालियसरीरअंगोवंगं असंपत्तसेवट्टसंघडणं वज्ज पंचण्हं संघडणाणमेक्कदरं वण्ण-गंध-रस-फासं मणुसगदिपाओगाणुपुव्वी अगुरुअलहु-उवघाद-परघाद-उस्सासं दोण्हं विहायगदीणमेकदरं तस-चादर-पज्जत्त-पत्तेयसरीरं Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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