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________________ २६४] .. छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [ १, ९-१, १६ दर्शनावरणीय कर्मकी नौ प्रकृतियां हैं ॥ १५ ॥ णिदाणिद्दा पयलापयला थीणगिद्धी णिद्दा पयला य चक्खुदंसगावरणीयं अचक्खुदंसणावरणीयं ओहिदसणावरणीयं केवलदसणावरणीयं चेदि ॥ १६ ॥ निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला, त्यानगृद्धि, निद्रा और प्रचला; तथा चक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शनावरणीय, अवधिदर्शनावरणीय और केवलदर्शनावरणीय, ये नौ दर्शनावरणीय कर्मकी उत्तर प्रकृतियां हैं ।। १६ ॥ निद्रानिद्रा प्रकृतिके तीव्र उदयसे जीव वृक्षके ऊपर, विषम भूमिपर अथवा जहां कहीं भी घुरघुराता हुआ या नहीं भी घुरघुराता हुआ गाढ निद्रामें सोता है । प्रचलाप्रचला प्रकृतिके तीव्र उदयसे प्राणी बैठा हुआ या खड़ा हुआ भी खूब सोता है । उस अवस्थामें उसके मुंहसे लार गिरने लगती है तथा शरीर कांपता है । स्त्यानगृद्धिके तीव्र उदयसे उठानेपर भी जीव पुनः सो जाता है, सोता हुआ भी काम किया करता है, बड़बड़ाता और दांतोंको कडकडाता है। निद्रा प्रकृतिके तीव्र उदयसे जीव अल्प कालके लिये सोता है, उठानेपर शीघ्रतासे उठ बैठता है, और मन्द शब्दके द्वारा भी सचेत हो जाता है । प्रचला प्रकृतिके तीव्र उदयसे नेत्र वालुकासे भरे हुएके समान बोझल होते हैं, सिर भारी भारको उठाए हुएके समान भारी हो जाता है, नेत्र बार बार खुलते और बंद होते हैं, निद्राके कारग गिरता हुआ भी अपनेको सम्हाल लेता है, थोड़ा थोड़ा कांपता है और सावधान सोता है । ये पांचों ही प्रकृतियां चूंकि जीवकी चेतनाको नष्ट करके उसके दर्शन गुणका अवरोध करती हैं, इसीलिये ये दर्शनावरणीयके अन्तर्गत हैं। ज्ञानको उत्पन्न करनेवाले प्रयत्नसे सम्बद्ध स्वसंवेदनको दर्शन कहते हैं । अभिप्राय यह कि जो उपयोग आत्माको विषय करता है वह दर्शन कहलाता है। चक्षुरिन्द्रिय सम्बन्धी ज्ञानको उत्पन्न करनेवाले प्रयत्नसे संयुक्त स्वसंवेदनके होनेपर - मैं रूप देखनेमें समर्थ हूं' इस प्रकारकी सम्भावनाके हेतुको चक्षुदर्शन कहते हैं । इस चक्षुदर्शनका आवरण करनेवाले कर्मको चक्षुदर्शनावरणीय कर्म कहते हैं । चक्षुरिन्द्रियके अतिरिक्त शेष चार इन्द्रियोंके और मनके दर्शनको अचक्षुदर्शन कहते हैं । इस अचक्षुदर्शनका जो आवरण करता है वह अचक्षुदर्शनावरणीय कर्म है । अवधिके दर्शनको अवधिदर्शन कहते हैं। उस अवधिदर्शनका जो आवरण करता है उसे अवधिदर्शनावरणीय कर्म कहते हैं । प्रतिपक्षसे रहित जो दर्शन होता है उसे केवलदर्शन कहते हैं । उस केवलदर्शनका आवरण करनेवाले कर्मको केवलदर्शनावरणीय कर्म कहते हैं । वेदणीयस्स कम्मस्स दुवे पयडीओ ॥ १७॥ वेदनीय कर्मकी दो प्रकृतियां हैं ॥ १७ ॥ सादावेदणीयं चेव असादावेदणीयं चेव ॥ १८ ॥ सातावेदनीय और असातावेदनीय ये दो उस वेदनीय कर्मकी प्रकृतियां हैं ॥ १८ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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