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________________ २२२] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, ७, ४२ अवगदवेदएसु अणियट्टिप्पहुडि जाव अजोगिकेवली ओघं ॥ ४२ ॥ अपगतवेदियोंमें अनिवृत्तिकरणके अवेद भागसे लेकर अयोगिकेवली तक इन भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ ४२ ॥ कसायाणुवादेण कोधकसाइ-माणकसाइ-मायकसाइ-लोभकसाईसु मिच्छादिहिप्पहुडि जाव सुहुमसांपराइयउवसमा खवा ओघ ।। ४३ ॥ कषायमार्गणाके अनुवादसे क्रोधकषायी, मानकषायी, मायाकषायी और लोभकषायी जीवोंमें मिथ्यादृष्टिसे लेकर सूक्ष्मसाम्पराय उपशामक और सूक्ष्मसाम्पराय क्षपक तक इन भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ ४३ ॥ अकसाईसु चदुट्ठाणी ओघ ॥४४॥ अकषायी जीवोंमें उपशान्तकषाय आदि चारों भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है। णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणि-विभंगणाणीसु मिच्छादिट्ठी सासणसम्मादिट्ठी ओघ ॥ ४५ ॥ ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी और विभंगज्ञानी जीवोंमें मिथ्यादृष्टि और सासादनसम्यग्दृष्टि भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ ४५ ॥ आभिणिबोहिय-सुद-ओधिणाणीसु असंजदसम्मादिट्टिप्पहुडि जाव खीणकसायवीदराग-छदुमत्था ओघं ॥ ४६॥ आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानियोंमें असंयतसम्यग्दृष्टिसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ तक उक्त भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ ४६॥ मणपज्जवणाणीसु पमत्तसंजदप्पहुडि जाव खीणकसाय-वीयराग-छदुमत्था ओघ । मनःपर्ययज्ञानियोंमें प्रमत्तसंयतसे लेकर क्षीणकषाय-वीतराग-छद्मस्थ तक इन भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ ४७॥ केवलणाणीसु सजोगिकेवली अजोगिकेवली ओपं ॥ ४८ ॥ केवलज्ञानियोंमें सयोगिकेवली और अयोगिकेवली भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है । संजमाणुवादेण संजदेसु पमत्तसंजदप्पहुडि जाव अजोगिकेवली ओपं ॥ ४९ ॥ संयममार्गणाके अनुवादसे संयतोंमें प्रमत्तसंयतसे लेकर अयोगिकेवली तक इन भावोंकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ ४९ ॥ सामाइय-छेदोवट्ठावणसुद्धिसंजदेसु पमत्तसंजदप्पडुडि जाव अणियट्टि त्ति ओघं। सामायिक और छेदोपस्थापनाशुद्धिसंयतोंमें प्रमत्तसंयतसे लेकर अनिवृत्तिकरण तक इन Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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