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________________ प्रस्तावना [२१ करनेपर भी क्षमाभाव धारण करना, गुरुजनोंकी सेवा-सुश्रूषा करना और व्रत-शीलादिको पालन करना पालेश्याके चिन्ह हैं। किसीके प्रति पक्षपात न करना, किसीसे राग-द्वेष नहीं रखना, अपनी प्रवृत्तिको शान्त रखना, निरन्तर प्रसन्न चित्त रहना, धर्म-सेवन करते हुए भी निदान (फलकी इच्छा ) न करना और सर्व प्राणियोंपर समभाव रखना ये शुक्ल लेश्याके चिन्ह हैं। पहले गुणस्थानसे लेकर चौथे गुणस्थान तकके जीवोंके यथासंभव छहों लेश्याएं होती हैं। आगे सातवें गुणस्थान तक पीत आदि तीन शुभ लेश्याएं पाई जाती हैं और आठवेंसे लेकर तेरहवें गुणस्थानतक शुक्ललेश्या होती है। चौदहवें गुणस्थानवर्ती और सिद्धजीव लेश्याओंके लेपसे रहित होनेके कारण अलेश्य कहलाते हैं । इस प्रकारसे लेश्याओंके द्वारा जीवोंके अन्वेषण करनेको लेश्यामार्गणा कहते हैं। ११ भव्यत्वमार्गणा- जिन जीवोंमें मोक्ष जानेकी योग्यता पाई जाती है, अवसर पाकर जिनके भीतर सम्यग्दर्शनादि गुण कभी न कभी अवश्य प्रकट होनेवाले हैं, उन्हें भव्य कहते हैं । किन्तु संसारमें कुछ ऐसे भी जीव हैं, जिन्हें बाहिरी उत्तमसे उत्तम निमित्त मिलनेपर भी उनके आत्मिक गुणोंका न कभी विकास होनेवाला है और न कभी सम्यग्दर्शनादि गुण भी प्राप्त होनेवाले हैं, उन्हें अभव्य कहते हैं। अभव्य जीवोंके एकमात्र पहिला मिथ्यात्वगुणस्थान ही रहता है इससे उपर वे कभी नहीं चढ़ सकते और न कभी मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं। भव्योंके सभी गुणस्थान होते हैं। सिद्धजीव भव्यत्व और अभव्यत्व भावसे रहित होते हैं। इस प्रकारसे इस मार्गणाद्वारा सर्व जीवोंका अनुमार्गण किया जाता है । - १२ सम्यक्त्वमार्गणा- तत्त्वार्थ श्रद्धानको सम्यक्त्व कहते हैं। तत्त्वार्थनाम आप्त, आगम और पदार्थका है, इसके विषयमें दृढ़श्रद्धा, रुचि या प्रतीतिको सम्यग्दर्शन कहते हैं । यह व्यवहारनयकी अपेक्षा लक्षण है। निश्चयनयकी अपेक्षा अन्य समस्त परद्रव्योंसे आत्म-स्वरूपको भिन्न समझकर बहिर्मुखी दृष्टि हटाकर अन्तर्मुखी दृष्टि करके आत्माके यथार्थ स्वरूपका अनुभव कर उसमें स्थिर होनेको सम्यग्दर्शन कहते हैं। सम्यक्त्वके तीन भेद हैं- औपशमिक सम्यक्त्व, क्षायिक सम्यक्त्व और क्षायोपशमिक या वेदक सम्यक्त्व । इन तीनोंका स्वरूप पहले बतला आये हैं। औपशमिक सम्यक्त्व चौथे गुणस्थानसे लेकर ग्यारहवें गुणस्थानतक पाया जाता है । क्षायोपशमिक चौथेसे सातवें गुणस्थानतक होता है और क्षायिकसम्यक्त्व चौथेसे चौदहवें गुणस्थानतकके जीवोंके तथा सिद्धोंके पाया जाता है । सम्यग्मिथ्यात्व कर्मके उदयसे जिनका सम्यक्त्व छूट जाता है और जिनकी श्रद्धा सम्यक्त्व और मिथ्यात्व इन दोनोंसे सम्मिश्रित रहती है उन्हें सम्यग्मिथ्यादृष्टि कहते हैं। ऐसे जीवोंके तीसरा गुणस्थान होता है । जिनका सम्यक्त्व अनन्तानुबन्धी कषायके उदयसे नष्ट हो गया है, किन्तु जो अभी मिथ्यात्व गुणस्थानमें नहीं पहुंचे हैं, ऐसे जीवोंको सासादनसम्यग्दृष्टि कहते हैं। उनके दूसरा गुणस्थान पाया जाता है । मिथ्यात्वकर्मके उदयवाले जीवोंको मिथ्यादृष्टि कहते हैं । इनके पहिला गुणस्थान होता है । इस प्रकारसे सम्यक्त्वका Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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