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________________ २१२] छक्खंडागमे जीवट्ठाणं [१, ६, ३६५ उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ ३६३ ॥ पमत्त-अपमत्तसंजदाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ ३६४ ॥ उक्कस्सेण पण्णारस रादिदियाणि ॥ ३६५ ॥ उपशमसम्यग्दृष्टि प्रमत्त और अप्रमत्त संयतोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनका जघन्य अन्तर एक समय मात्र होता है ॥ ३६४ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर पन्द्रह रात-दिन मात्र होता है ॥ २६५ ॥ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥३६६॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥३६७॥ एक जीवकी अपेक्षा उनका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहुर्त मात्र होता है ॥ ३६६ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ ३६७ ॥ तिण्हमुवसामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ ३६८ ॥ उक्कस्सेण वासपुधत्तं ॥ ३६९ ॥ ___ उपशमसम्यग्दृष्टि अपूर्वकरण, अनिवृत्तिकरण और सूक्ष्मसाम्पराय इन तीन उपशामकोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनका अन्तर जघन्यसे एक समय मात्र होता है ॥ ३६८ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व मात्र होता है ॥ ३६९॥ __ एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥३७०॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥३७१॥ एक जीवकी अपेक्षा उनका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ ३७० ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ ३७१ ॥ __ उवसंतकसाय-चीदराग-छदुमत्थाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥ ३७२ ॥ उक्कस्सेण वासपुधत्तं ।। ३७३ ॥ ___ उपशमसम्यग्दृष्टि उपशान्तकषाय-वीतराग-छद्मस्थ जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनका जघन्य अन्तर एक समय मात्र होता है ॥ ३७२ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व मात्र होता है ॥ ३७३ ॥ एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं ॥ ३७४ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उनका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ ३७४ ॥ सासणसम्मादिद्वि-सम्मामिच्छादिट्ठीणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एगसमयं ॥३७५॥ उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेजदिभागो ॥३७६॥ सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा उनका अन्तर जघन्यसे एक समय मात्र होता है ॥३७५॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमके असंख्यातवें भाग मात्र होता है ॥ ३७६ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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