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________________ २०२ ] छक्खंडागमे जीवद्वाणं जीवोंकी अपेक्षा अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥ २४६ ॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण अंतोमुहुत्तं ॥ २४७ ॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ २४८ ॥ एक जीवकी अपेक्षा मन:पर्ययज्ञानी प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ २४७ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ॥ २४८॥ चदुण्हमु सामगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहणेण एगसमयं ।। २४९ ।। उक्कस्सेण वासपुधत्तं ।। २५० ।। मन:पर्ययज्ञानी चारों उपशामकोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय मात्र अन्तर होता है ॥ २४९ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व मात्र होता है ॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण अंतोमुहुत्तं ।। २५१ ।। उक्कस्सेण पुव्वकोडी देणं ॥ एक जीवकी अपेक्षा मन:पर्ययज्ञानी चारों उपशामकोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त मात्र होता है ।। २५१ ॥ उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पूर्वकोटि मात्र होता है ।। २५२ ॥ चदुण्हं खवगाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहणेण एगसमयं ।। २५३ ॥ उक्कस्सेण वासपुधत्तं ॥ २५४ ॥ मन:पर्ययज्ञानी चारों क्षपकोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय मात्र अन्तर होता है || २५३ || उन्हींका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व मात्र होता है | एगजीवं पडुच्च णत्थि अंतरं, णिरंतरं ।। २५५ ।। एक जीवकी अपेक्षा मन:पर्ययज्ञानी चारों क्षपकोंका अन्तर नहीं होता, निरन्तर है ॥२५५॥ haणाणी सजोगकेवली ओधं ।। २५६ ॥ केवलज्ञानी जीवोंमें सयोगिकेवलियोंके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २५६ ॥ [ १, ६, २४७ अजोगकेवली ओधं ॥ २५७ ॥ केवलज्ञानी अयोगिकेवलियोंके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २५७ ॥ संजमाणुवादेण संजदेसु पमत्तसंजद पहुडि जाव उवसंतकसाय-वीदराग- छदुमत्था त्ति मणपज्जवणाणिभंगो ॥ २५८ ॥ संयममार्गणाके अनुवादसे संयतो में प्रमत्तसंयत से लेकर उपशान्तकषाय- वीतराग-छद्मस्थ तक संयतों के अन्तरकी प्ररूपणा मन:पर्ययज्ञानियोंके समान है ।। २५८ ॥ चदुहं खवा अजोगिकेवली ओघं ।। २५९ ।। संयतों में चारों क्षपक और अयोगिकेवलियोंके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥२५९॥ सजोगकेवली ओधं ॥ २६० ॥ संयतों में सयोगिकेवली संयतोंके अन्तरकी प्ररूपणा ओघके समान है ॥ २६० ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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