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________________ १, ६, १५] अंतराणुगमे ओघणिद्देसो [१७५ अथवा उतरते हुए अनिवृत्तिकरण उपशामक जीव अपूर्वकरण गुणस्थानवर्ती उपशामक हो गए । इस प्रकार नाना जीवोंकी अपेक्षा अपूर्वकरण उपशामक गुणस्थानका एक समय प्रमाण जघन्य अन्तरकाल प्राप्त हो गया। इसी प्रकारसे अनिवृत्तिकरण उपशामकोंका, सूक्ष्मसाम्पराय उपशामकोंका और उपशान्तकषाय उपशामकोंका एक समय प्रमाण जघन्य अन्तर जानना चाहिए। उक्कस्सेण वासपुधत्तं ॥ १३ ॥ नाना जीवोंकी अपेक्षा उक्त चारों उपशामकोंका उत्कृष्ट अन्तर वर्षपृथक्त्व मात्र है ॥ . सात आठ अथवा बहुत-से अपूर्वकरण उपशामक जीव अनिवृत्तिकरण उपशामक अथवा अप्रमत्तसंयत हुए और मर करके देव हो गये । इस प्रकार अपूर्वकरण उपशामक गुणस्थान उत्कृष्टरूपसे वर्षपृथक्त्वके लिए अन्तरको प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् वर्षपृथक्त्वकालके व्यतीत हो जानेपर सात आठ अथवा बहुत-से अप्रमत्तसंयत जीव अपूर्वकरण उपशामक हो गये । इस प्रकार अपूर्वकरण उपशामकोका वह वर्षपृथक्त्वप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर प्राप्त हो गया। इसी प्रकार शेष अनिवृत्तिकरणादि तीनों उपशामकोंका अन्तर वर्षपृथक्त्व प्रमाण जानना चाहिए। एगजीवं पडुच्च जहण्णेण अंतोमुहुत्तं ॥ १४ ॥ एक जीवकी अपेक्षा चारों उपशामकोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है ॥ १४ ॥ एक अपूर्वकरण उपशामक जीव अनिवृत्तिकरण उपशामक, सूक्ष्मसाम्परायिक उपशामक और उपशान्तकषाय उपशामक होकर फिरसे सूक्ष्मसाम्परायिक उपशामक और अनिवृत्तिकरण उपशामक होता हुआ अपूर्वकरण उपशामक हो गया। इस प्रकार अन्तर्मुहूर्त काल प्रमाण जघन्य अन्तर उपलब्ध हुआ। अनिवृत्तिकरणसे लगाकर पुनः अपूर्वकरण उपशामक होनेके पूर्व तकके इन पांचों ही गुणस्थानोंके कालोंको एकत्र करनेपर भी वह काल अन्तर्मुहूर्त ही होता है । इसी प्रकार एक जीवकी अपेक्षा शेष तीनों उपशामकोंका अन्तर जानना जाहिए । उक्कस्सेण अद्धपोग्गलपरियट्ट देसूणं ॥ १५ ॥ ___ एक जीवकी अपेक्षा उक्त चारों उपशामकोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है ॥ १५ ॥ एक जीवकी अपेक्षा अपूर्वकरण गुणस्थानका उत्कृष्ट अन्तर- एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीवने तीनों ही करणोंको करके उपशमसम्यक्त्व और संयमको एक साथ प्राप्त होनेके प्रथम समयमें ही अनन्त संसारको छेदकर उसे अब पुद्गलपरिवर्तन मात्र करके अन्तर्मुहूर्त प्रमाण अप्रमत्तसंयतके कालका पालन किया (१)। पीछे प्रमत्तसंयत हुआ (२)। पुनः द्वितीयोपशमसम्यक्त्वको प्राप्त करके (३) हजारों प्रमत्त-अप्रमत्त परावर्तनोंको करके ( ४ ) उपशमश्रेणीके योग्य अप्रमत्तसंयत हो गया (५)। पुनः अपूर्वकरण ( ६ ), अनिवृत्तिकरण (७), सूक्ष्मसाम्पराय ( ८ ), उपशान्त Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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