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________________ १७४ ] छक्खंडागमे जीवद्वाणं [ १, ६, ११ अन्तरको प्राप्त हो पुनः संयमासंयमको प्राप्त हो गया। इस प्रकारसे संयतासंयतका सूत्रोक्त अन्तर्मुहूर्त काल प्रमाण जघन्य अन्तर प्राप्त हो जाता है । प्रमत्तसंयतका अन्तर- एक प्रमत्तसंयत जीव अप्रमत्तसंयत होकर सर्वलघु कालमें फिरसे प्रमत्तसंयत हो गया । इस प्रकारसे प्रमत्तसंयतका अन्तर्मुहूर्त काल प्रमाण जघन्य अन्तर प्राप्त हो जाता है । अप्रमत्तसंयतका अन्तर- एक अप्रमत्तसंयत जीव उपशमश्रेणीपर चढ़कर वहांसे लौटा और फिरसे अप्रमत्तसंयत हो गया। इस प्रकार से अप्रमत्तसंयतका अन्तर्मुहूर्त काल प्रमाण 'जघन्य अन्तर उपलब्ध हो जाता है । उक्कस्से अद्धपोग्गल परियङ्कं देणं ॥ ११ ॥ एक जीवकी अपेक्षा उक्त असंयतसम्यग्दृष्टि आदि चार गुणस्थानवर्ती जीवोंका उत्कृष्ट अन्तरकाल कुछ कम अर्ध पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण है ॥ ११ ॥ असंयतसम्यग्दृष्टि जीवका उत्कृष्ट अन्तर-- एक अनादि मिथ्यादृष्टि जीवने तीनों करणोंको करके प्रथमोपशमसम्यक्त्वको ग्रहण करते हुए अनन्त संसारको छेदकर उसे सम्यक्त्व ग्रहण करने के पहले समय में अर्ध पुद्गलपरिवर्तन मात्र किया । पुनः वह उपशमसम्यक्त्वके साथ अन्तर्मुहूर्त काल रहकर ( १ ) उसके 'कालमें छह आवली मात्र कालके अवशेष रह जानेपर सासादन गुणस्थानको प्राप्त होकर अन्तरको प्राप्त हुआ । पुनः मिथ्यात्वके साथ अर्ध पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण परिभ्रमण करके अन्तिम भवमें संयम अथवा संयमासंयमको प्राप्त होकर कृतकृत्य वेदकसम्यक्त्व होकर अन्तर्मुहूर्त प्रमाण संसारके शेष रह जानेपर परिणामोंके निमित्तसे असंयतसम्यग्दृष्टि हो गया। इस प्रकार सूत्रोक्त अन्तरकाल प्राप्त हो गया ( २ ) । पुनः अप्रमत्तभाव के साथ संयमको प्राप्त होकर (३) प्रमत्त - अप्रमत्त गुणस्थानों में हजारों परावर्तनोंको करके ( ४ ) क्षपक श्रेणी के योग्य विशुद्धिसे विशुद्ध होकर ( ५ ) अपूर्वकरण क्षपक (६), अनिवृत्तिकरण क्षपक (७), सूक्ष्मसाम्पराय क्षपक (८), क्षीणकषाय- वीतरागछद्मस्थ ( ९ ), सयोगकेवली ( १० ) और अयोगकेवली (११) हो कर निर्वाणको प्राप्त हो गया । इस प्रकार एक जीवको अपेक्षा असंयतसम्यग्दृष्टि जीवोंका वह उत्कृष्ट अन्तर इन ग्यारह अन्तर्मुहूर्तोसे म अर्थ पुगपरिवर्तन काल होता है। इसी प्रकारसे अपनी अपनी कुछ विशेषताके साथ संयतासंयत, प्रमत्तसंयत और अप्रमत्तसंयत जीवोंके भी इस उत्कृष्ट अन्तरको समझना चाहिये । चदुण्हमुव साम गाणमंतरं केवचिरं कालादो होदि ? णाणाजीवं पडुच्च जहण्णेण एग समयं ।। १२ । चारों उपशामकोंका अन्तर कितने काल होता है ? नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्यसे एक समय मात्र अन्तर होता है ॥ १२ ॥ सात आठ अथवा बहुत-से जीव अपूर्वकरणउपशामककालके क्षीण हो जानेपर अनिवृत्ति"करण उपशामक अथवा अप्रमत्तसंयत होते हुए मरणको प्राप्त हो करके देव हुए। इस प्रकार एक समय के लिए अपूर्वकरण गुणस्थान अन्तरको प्राप्त हो गया। तत्पश्चात् द्वितीय समय में अप्रमत्तसंयंत Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org.
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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