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________________ प्रस्तावना [१५ उसका भी उपशम करके ग्यारहवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है। किन्तु जो क्षपकश्रेणीपर चढ़ता हुआ इस गुणस्थानको प्राप्त हुआ है, वह अन्तर्मुहूर्त तक सूक्ष्म लोभका वेदन करता और प्रतिसमय उसके द्रव्यका असंख्यातगुणश्रेणीरूपसे निर्जरा करता हुआ अन्तिम समयमें उसका क्षय करके बारहवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है । ११ उपशान्तमोहगुणस्थान-- इस गुणस्थानमें वर्तमान जीवके मोहनीय कर्मकी समस्त प्रकृतियां उपशान्त हो चुकी हैं, अतः उसे उपशान्त मोह या उपशान्तकषाय कहते हैं। जिसप्रकार गंदले जलमें कतक ( निर्मली ) फल या फिटकरी डाल देनेपर उसका गंदलापन उपशान्त हो जाता है और ऊपर एकदम स्वच्छ जल रह जाता है, अथवा जैसे शरदऋतुमें सरोवरका जल गंदलापन नीचे बैठ जानेसे एकदम स्वच्छ हो जाता है, उसी प्रकार सम्पूर्ण मोहकर्मके उपशान्त हो जानेसे इस गुणस्थानवी जीवके परिणामोंमें एकदम निर्मलता आ जाती है और वह छद्मस्थ ( अल्पज्ञ ) रहते हुए भी यथाख्यात चारित्रको प्राप्त कर वीतराग संज्ञाको प्राप्त कर लेता है । किन्तु इस गुणस्थानका अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कालके समाप्त होते ही उपशान्त हुई कषाय पुनः उदयमें आ जाती हैं और यह ग्यारहवें गुणस्थानसे गिरकर वापिस नीचेके गुणस्थानोंमें चला जाता है। .. १२ क्षीणमोहगुणस्थान- क्षपकश्रेणीपर चढ़ते हुए जिस जीवने दशवें गुणरथानके अन्तमें सूक्ष्म लोभका क्षय कर दिया है, वह मोहके सर्वथा क्षय हो जानेसे दशवेंसे एकदम बारहवें गुणस्थानमें पहुंचता है और छमस्थ होते हुए भी यथाख्यातचारित्रको पाकर वीतराग संज्ञाको प्राप्त करता है । इस गुणस्थानका काल भी अन्तर्मुहूर्त है । जब उस कालमें दो समय शेष रह जाते हैं, तब निद्रा और प्रचला इन दो कर्मोंका एक साथ क्षय करता है । तत्पश्चात् अन्तिम समयमें ज्ञानावरणीयकर्मकी पांच प्रकृतियां, दर्शनावरणकी शेष रही चार प्रकृतियां और अन्तरायकी पांच प्रकृतियां इन चौदह प्रकृतियोंका एक साथ क्षय करके सर्वज्ञ और सर्वदर्शी बनता हुआ तेरहवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है। १३ सयोगिकेवलीगुणस्थान- दश गुणस्थानके अन्तमें मोहकर्मके और बारहवें गुणस्थानके अन्तमें ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, और अन्तरायकर्मके सर्वथा क्षय हो जानेसे जिनके क्षायिकअनन्तज्ञान, अनन्तदर्शन, अनन्तसुख, अनन्तवीर्यरूप, अनन्तचतुष्टय, तथा इनके साथ क्षायिकसम्यक्त्व, क्षायिक दान, क्षायिक लाभ, क्षायिक भोग और क्षायिक उपभोग, ये नौ लब्धियां प्रकट हो गई है और केवलज्ञानरूपी सूर्यकी किरणोंके समूहसे जिनका अज्ञानरूपी अन्धकार सर्वथा नष्ट हो गया है, अतः जिन्होंने परमात्मपदको प्राप्त कर लिया है, जो योगसेसहित होनेके कारण सयोगी कहलाते हैं और असहाय केवलज्ञान और केवलदर्शनसे सहित होनेके कारण केवली कहलाते हैं, ऐसे अरिहन्त परमेष्ठीकी सर्वज्ञत्व और सर्वदर्शित्व अवस्था इस गुणस्थानमें प्रकट हो जाती है । ये सयोगिकेवली भगवान् एक भी कर्मका क्षय नहीं करते है; किन्तु अवशिष्ट रहे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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