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________________ छक्खंडागमे जीवद्वाणं उक्कस्सेण पलिदोवमस्स असंखेज्जदिभागो ॥ ८४ ॥ लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्योंका उत्कृष्ट काल नाना जीवोंकी अपेक्षा पल्योपमके असंख्यातवें भाग प्रमाण हैं ॥ ८४ ॥ १४२ ] सव्वद्धा ।। ८७ ।। एगजीवं पडुच्च जहणेण खुद्दाभवग्गहणं ॥ ८५ ॥ लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्यों का एक जीवकी अपेक्षा जघन्य काल क्षुद्रभवग्रहण प्रमाण है ॥ ८५ ॥ उक्कस्सेण अंतोमुहुत्तं ॥ ८६ ॥ उक्त लब्ध्यपर्याप्तक मनुष्योंका उत्कृष्ट काल एक जीवकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त है ॥ ८६ ॥ देवगदी देवेसु मिच्छादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीवं पडुच्च Jain Education International [ १, ५, ८४ देवगति में देवोमें मिथ्यादृष्टि जीव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं ॥ ८७ ॥ एगजीवं पडुच्च जहणेण अंतोमुहुत्तं ॥ ८८ ॥ एक जीवकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि देवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है ॥ ८८ ॥ उक्कस्सेण एक्कत्तीस सागरोवमाणि ॥ ८९ ॥ एक जीवकी अपेक्षा मिध्यादृष्टि देवोंका उत्कृष्ट काल इकतीस सागरोपम है ॥ ८९ ॥ सासणसम्मादिट्ठी सम्मामिच्छादिट्ठी ओघं ॥ ९० ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि देवोंका काल ओघके समान है ॥ ९० ॥ असंजदसम्मादिट्ठी केवचिरं कालादो होंति ? णाणाजीचं पडुञ्च मव्वद्धा ।। ९१ ।। असंयतसम्यग्दृष्टि देव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होते हैं । एगजी पडुच्च जहणेण अंतोमुहुतं ।। ९२ ।। एक जीवकी अपेक्षा असंयतसम्यग्दृष्टि देवोंका जघन्य काल अन्तर्मुहूत है ॥ ९२ ॥ उक्कस्सं तेत्तीसं सागरोत्राणि ।। ९३ । एक जी की अपेक्षा असंयतसम्यग्दृष्टि देवोंका उत्कृष्ट काल तेतीस सागरोपन है ॥ ९३ ॥ भवणवासिय पहुडि जाव सदार - सहस्सार कप्पवासियदेवेषु पिच्छादिडी असंजदसम्मादिट्ठी केवचिरं कालादी होंति ? णाणाजीवं पडुच्च सव्वद्धा । “४ ॥ भवनवासी देवोंसे लेकर शतार - सहस्रार कल्पवासी देवों तक मिथ्यादृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि देव कितने काल होते हैं ? नाना जीवोंकी अपेक्षा सर्व काल होत ह९४ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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