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________________ प्रस्तावना [१३ कहने का अभिप्राय यह कि जो परिणाम किसी एक जीवके प्रथम समयमें हो सकता है, वही परिणाम किसी दूसरे जीवके दूसरे समयमें, तीसरे जीवके तीसरे समयमें और चौथे जीवके चौथे समयमें हो सकता है। इस प्रकार उपरितन समपवर्ती जीवोंके परिणाम अधस्तन समयवर्ती जीवोंके परिणामोंके साथ सदृशता रखते हुए अधःप्रवृत्त कर गके कालमें पाये जाते हैं। यद्यपि इस करणके मांडनेवाले प्रत्येक जीवके परिणाम आगे आगे के समयोंमें उत्तरोत्तर अनन्तगणी विशद्धिको लिए हुए ही होते हैं, तथापि उसके साथ उन्हीं समयोंमें वर्तमान अन्य जीवोंके परिणाम कदाचित् सदृश भी हो सकते हैं और कदाचित् विसदृश भी हो सकते हैं। यही बात उसके पीछे इस करणके मांडनेवाले जीवोंके परिणामों के विषयमें जानना चाहिए । अधःकरण परिणामका काल समाप्त होते ही सातिशय अप्रमत्तसंयतगुणस्थानका काल समाप्त हो जाता है और वह जीव आठवें गुणस्थानमें प्रवेश करता है। यहां यह ज्ञातव्य है कि आगेके पांच गुणस्थान दो श्रेणियोंमें विभक्त हैं- एक उपशमश्रेणी और दूसरी क्षपकश्रेणी । जो जीव मोहनीयकर्मके उपशमनके लिए उद्यत होता है, वह उपशमश्रेणीपर चढ़ता है और जो कर्मोके क्षय करनेके लिए उद्यत होता है, वह क्षपक श्रेणीपर चढ़ता है । उपशमश्रेणीके चार गुणस्थान हैं- आठवां, नवां, दशवां और ग्यारहवां । क्षपकश्रेणीके भी चार गुणस्थान हैं- आठवां, नववां, दशवां और बारहवां । इन दोनों ही श्रेणियोंका जघन्य और उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है । तथा प्रत्येक श्रेणीके प्रत्येक गुणस्थानका कालभी अन्तर्मुहूर्त है । आगे दोनों ही श्रेणियोंके गुणस्थानोंका एक साथ ही वर्णन किया जायगा । यहीं एक बात और भी जानने के योग्य है कि वेदकसम्यक्त्व सातवेंसे आगे के गुणस्थानोंमें नहीं होता है । अतः जो भी जीव ऊपर चढ़ना चाहता है, उसका द्वितीयोपशमसम्यक्त्व या क्षायिकसम्यक्त्वको यहीं धारण करना आवश्यक है। क्षायिकसम्यक्त्वी जीव तो दोनोंही श्रेणीयोंपर चढ़ सकता है, किन्तु द्वितीयोपशम सम्यक्त्वी केवल उपशमश्रेणीपर ही चढ़ता है । ८ अपूर्वकरणसंयतगुणस्थान - अधःप्रवृत्तकरणके कालमें वर्तमान जीव किसीभी कर्मका उपशम या क्षय नहीं करता है, किन्तु प्रतिसमय अनन्तगुणी विशुद्धिसे बढ़ता रहता है। आठवें गुणस्थानमें प्रवेश करतेही अधःकरणकी अपेक्षा उसके परिणामोंकी विशुद्धि और भी अनन्तगुणी हो जाती है। इस प्रकारकी विशुद्धिवाले परिणाम इसके पूर्व कभी नहीं प्राप्त हुए थे, इस लिए इन्हें अपूर्वकरण ( परिणाम ) कहते हैं। जिसप्रकार अधःकरणमें भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम सदृश और विसदृश दोनोंही प्रकारके होते हैं, वैसा अपूर्वकरणमें नहीं है । किन्तु यहांपर भिन्न समयवर्ती जीवोंके परिणाम अपूर्व ही अपूर्व होते हैं, अर्थात् विसदृश ही होते हैं, सदृश नहीं होते । इस गुणस्थानमें प्रवेश करने के प्रथम समयसे ही चार कार्य प्रत्येक जीवके प्रारम्भ हो जाते हैं१ गुणश्रेणीनिर्जरा, २ गुणसंक्रमण, ३ स्थितिकांडकघात और ४ अनुभागकांडकघात । प्रतिसमय Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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