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________________ १, ४, १२८ ] फोसणाणुगमे णाणमग्गणा [ ११९ जीवोंमें मिथ्यादृष्टि, गुणस्थानसे लेकर अनिवृत्तिकरण गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीवोंका . स्पर्शनक्षेत्र ओघके समान है ॥ १२० ॥ णवरि लोभकसाईसु सुहुमसांपराइयउवसमा खवा ओघं ।। १२१ ॥ विशेष बात यह है कि लोभकषायी जीवोंमें सूक्ष्मसापराय गुणस्थानवर्ती उपशमक और क्षपक जीवोंका क्षेत्र ओघके समान है ॥ १२१ ॥ अकसाईसु चदुट्ठाणमोघं ॥ १२२ ॥ ___ अकषायी जीवोंमें उपशान्तकषाय आदि चार गुणस्थानवालोंका स्पर्शनक्षेत्र ओघके समान है ॥ १२२ ॥ णाणाणुवादेण मदिअण्णाणि-सुदअण्णाणीसु मिच्छादिट्ठी ओघं ॥ १२३ ॥ ज्ञानमार्गणाके अनुवादसे मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंका स्पर्शनक्षेत्र ओघके समान है ॥ १२३ ॥ सासणसम्मादिट्ठी ओघं ॥ १२४ ॥ मतिअज्ञानी और श्रुतअज्ञानी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शनक्षेत्र ओघके समान है ॥ विभंगणाणीसु मिच्छादिट्ठीहि केवडियं खेत्तं फोसिदं ? लोगस्स असंखेज्जदिभागो ॥ १२५ ॥ विभंगज्ञानियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंने कितना क्षेत्र स्पर्श किया है ? लोकका असंख्यातवां भाग स्पर्श किया है ॥ १२५ ॥ अट्ठ चोद्दसभागा देसूणा सव्वलोगो वा ॥ १२६ ॥ भिंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीवोंने अतीत और अनागत कालकी अपेक्षा कुछ कम आठ बटे चौदह भाग और सर्व लोक स्पर्श किया है ॥ १२६ ॥ विभंगज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव विहारवत्स्वस्थान और वेदना, कषाय व वैक्रियिक समुद्घातको प्राप्त होकर कुछ कम आठ बटे चौदह भागोंको तथा मारणान्तिकसमुद्घातको प्राप्त होकर सर्व लोकको स्पर्श करते हैं; यह इस सूत्रका अभिप्राय ग्रहण करना चाहिये । सासणसम्मादिट्ठी ओघं ॥ १२७॥ विभंगज्ञानी सासादनसम्यग्दृष्टि जीवोंका स्पर्शनक्षेत्र ओघके समान है ॥ १२७ ॥ आभिणियोहिय-सुद-ओधिणाणीसु असंजदसम्मादिहिप्पहुडि जाव खीणकसायवीदराग-छदुमत्था त्ति ओघं ॥ १२८ ॥ आभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमें असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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