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________________ खेत्तपमाणागमे जोगमग्गणा [ ९३ औदारिककाययोगियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवोंका क्षेत्र ओघके समान सर्व लोक है ॥ ३३ ॥ सास सम्मादिपिडि जाव सजोगिकेवली लोगस्स असंखेज्जदिभागे ॥ ३४ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती औदारिककाययोगी जीव लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥ ३४ ॥ १, ३, ४० ] यहां औदारिककाययोगकी विवक्षा होनेसे औदारिक मिश्रकाययोग और कार्मणकाययोगके साथमें होनेवाले कपाट, प्रतर और लोकपूरण समुद्घातोंकी सम्भावना नहीं है; इसीलिए औदारिककाययोगी सयोगिकेवली लोकके असंख्यातवें भाग में रहते हैं, ऐसा इस सूत्र में कहा गया है । सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि औदारिककाययोगी जीवों के उपपाद पद तथा प्रमत्तगुणस्थानवर्ती औदारिककाययोगी जीवोंके आहारकसमुद्घात नहीं होता है । ओरालियमस्सकाय जोगीसु मिच्छाइट्ठी ओघं ।। ३५ ।। औदारिक मिश्रकाययोगियोंमें मिथ्यादृष्टि जीव ओघके समान सर्व लोकमें रहते हैं ॥ ३५ ॥ सासणसम्मादिट्ठी असंजदसम्मादिट्ठी सजोगिकेवली केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेज्जदिभागे || ३६ ॥ औदारिक मिश्रकाययोगी सासादनसम्यग्दृष्टि, असंयतसम्यग्दृष्टि और संयोगिकेवली कितने क्षेत्र में रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग में रहते हैं ॥ ३६ ॥ व्किायजोगीसु मिच्छाइट्टिप्पहुडि जाव असंजद सम्मादिट्ठी केवडिखे ते १ लोगस्स असंखेज्जदिभागे ॥ ३७ ॥ वैक्रियिककाययोगियोंमें मिथ्यादृष्टि गुणस्थान से लेकर असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ।। ३७ ॥ वेव्विय मिस्सकाय जोगीसु मिच्छादिट्ठी सासणसम्मादिट्ठी असंजदसम्मादिड्डी वडिखेते ? लोगस्स असंखेज्जदिभागे ॥ ३८ ॥ वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में मिथ्यादृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और असंयतसम्यग्दृष्टि जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भागमें रहते हैं ॥ ३८ ॥ आहारकायजोगी आहार मिस्सकाय जोगीसु पमत्तसंजदा केवडिखेत्ते ? लोगस्स असंखेज्जदिभागे || ३९ ॥ आहारककाययोगियों और आहारकमिश्रकाययोगियोंमें प्रमत्तसंयत गुणस्थानवर्ती जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग में रहते हैं ॥ ३९ ॥ कम्मइयकायजोगीसु मिच्छाइट्ठी ओघं ॥ ४० ॥ कार्मणका योगियों में मिथ्यादृष्टि जीव ओघमिथ्यादृष्टि जीवोंके समान सर्व लोकमें रहते हैं ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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