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________________ १, ३, ३ ] खेत्तपमाणाणुगमे ओघणिसे [ ८७ आकारके धारण करनेको वैक्रियिकसमुद्घात कहते हैं। मरनेके पूर्व आत्मप्रदेशोंका ऋजुगतिसे अथवा विग्रहगतिसे शरीरके बाहिर निकलकर जहां उत्पन्न होना है उस क्षेत्र तक जाकर अन्तर्मुहूर्त काल तक रहना, इसे मारणान्तिकसमुद्घात कहते हैं । वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घातसे इसमें यह विशेषता है कि यह तो केवल बद्धायुष्क जीवोंके ही होता है, परन्तु उक्त दोनों समुद्घात बद्धायुष्कोंके होते हैं और अबद्धायुष्कोंके भी होते हैं, तथा मारणान्तिकसमुद्घात जहांपर उत्पन्न होना है उसी दिशा अभिमुख होता है, परन्तु वेदनासमुद्घात और कषायसमुद्घात के लिये ऐसा कुछ नियम नहीं है । तैजसशरीरके विसर्पणका नाम तैजससमुद्घात है । वह दो प्रकारका होता है-निःस्सरणात्मक और अनिःस्सरणात्मक । इनमें जो निःस्सरणात्मक तैजससमुद्घात है वह भी दो प्रकारका है- प्रशस्त तैजस और अप्रशस्त तैजस । किसी महान् तपस्वी साधुके हृदयमें दुर्भिक्षादिसे पीड़ित जनपदादिको देखकर अनुकम्पा वश उनके उद्धारार्थ दाहिने कंधेसे जो तैजस पुतला निकलता है उसे प्रशस्त तैजससमुद्घात कहते हैं और तपस्वीके किसीपर रुष्ट हो जाने पर नौ योजन चौड़े और बारह योजन लम्बे क्षेत्रको भस्म करनेवाला बायें कन्धेसे जो तैजस पुतला निकलता है उसे अप्रशस्त तैजससमुद्घात कहते हैं । शरीरके भीतर जो तेज और चमक होती है उसे अनिःसरणात्मक तैजससमुद्घात कहते हैं। यहांपर उसकी विवक्षा नहीं है I प्रमत्त गुणस्थानवर्ती महामुनिके हृदयमें सूक्ष्म तत्त्वके विषय में शंका उत्पन्न होनेपर तथा उनके निवासक्षेत्रमें केवली या श्रुतकेवलीके उपस्थित न होनेपर उस शंकाके समाधानार्थ मस्तकसे एक हाथका जो धवलवर्ण पुतला निकलता है उसका नाम आहारकसमुद्धात है । वह केवलीके पादमूलका स्पर्श करके वापिस साधुके शरीर में प्रविष्ट होकर मुनिकी शंकाका समाधान कर देता है। आयु कर्मके अल्प तथा शेष तीन अघातिया कर्मोंके अधिक स्थितिसे संयुक्त होनेपर उनके समीकरणार्थ केवली भगवान् के दण्ड, कपाट, प्रतर और लोकपूरण रूपसे जो शरीरके बाहिर आत्मप्रदेश फैलते हैं उसे केवलसमुद्घात कहते हैं । . पूर्व शरीरको छोड़कर नवीन शरीरके धारण करनेके लिये जो उत्तर भवके प्रथम समय में प्रवृत्ति होती है उसका नाम उपपाद है । इन दस अवस्थाओंके द्वारा जीव जितने आकाशके क्षेत्रको व्याप्त करता है उसी क्षेत्रका प्रकृत क्षेत्रानुगममें गुणस्थान और मार्गणाओंकी अपेक्षासे वर्णन किया गया है । यथा - स्वस्थान - स्वस्थान, वेदना, कषाय व मारणान्तिक समुद्घात और उपपादकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव सर्व लोकमें रहते हैं । सासणसम्माट्ठिप्प हुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति कवाडखेत्ते ? लोगस्स असंखेज्जदि भाए ॥ ३ ॥ सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थानसे लेकर अयोगिकेवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थानवर्ती जीव कितने क्षेत्रमें रहते हैं ? लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण क्षेत्रमें रहते हैं ॥ ३ ॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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