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________________ ५४ ] छक्खंडागमे जीवद्वाणं [ १, २, २ केवली और श्रुतकेवलियोंके द्वारा परंपरा से आये हुए अनुरूप ज्ञानको अनुगम कहते हैं । द्रव्य प्रमाणके अनुगमको अथवा द्रव्य और प्रमाणके अनुगमको द्रव्यप्रमाणानुगम कहते हैं । इस द्रव्यप्रमाणानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है- ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश | गत्यादि मार्गणाभेदोंसे रहित केवल चौदह गुणस्थानोंकी अपेक्षा जीवोंके प्रमाणका निरूपण करना ओधनिर्देश है । तथा गति आदि मार्गणाओंके भेदोंसे भेदको प्राप्त हुए उन्हीं चौदह गुणस्थानोंका प्ररूपण करना आदेशनिर्देश है । अब प्रथमतः ओघनिर्देशकी अपेक्षा प्ररूपणा करनेके लिये आचार्य आगेका सूत्र कहते हैं ओघेण मिच्छाइट्ठी दव्वपमाणेण केवडिया ? अनंता ।। २ ।। सामान्यसे मिथ्यादृष्टि जीव द्रव्यप्रमाणकी अपेक्षा कितने हैं ? अनन्त हैं ॥ २ ॥ सूत्र दिये गये 'अनंता' इस पदके द्वारा मिथ्यादृष्टि जीवोंका प्रमाण अनन्त कहा गया है । एक एक अंक घटाते जानेपर जो संख्या कभी समाप्त नहीं होती है वह अनन्त कही जाती है । अथवा, जो संख्या एक मात्र केवलज्ञानकी विषय है उसे अनन्त समझना चाहिये । उस अनन्तके नामानन्त, स्थापनानन्त, द्रव्यानन्त, शाश्वतानन्त, गणनानन्त, अप्रदेशानन्त, एकानन्त, उभयानन्त, विस्तारानन्त, सर्वानन्त और भावानन्त; ये ग्यारह भेद हैं । इनमेंसे यहां गणनानन्तकी विवक्षा है । यह गणनानन्त तीन प्रकारका है- परीतानन्त, युक्तानन्त और अनन्तानन्त । इन तीन गणनानन्तों से यहां अनन्तानन्तरूप तीसरा भेद अपेक्षित है । इस अनन्तकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं, यह सूत्रका अभिप्राय है। यहां शंका हो सकती है कि सूत्रमें प्रयुक्त 'अनंता' इस सामान्य निर्देशसे अनन्तानन्तका बोध कैसे हो सकता है ? इसका उत्तर यह है कि “ मिथ्यादृष्टि जीव कालकी अपेक्षा अनन्तानन्त अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियोंके द्वारा अपहृत अर्थात् समाप्त नहीं होते हैं इस आगेके (३) ज्ञापक सूत्रसे जाना जाता है कि मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त हैं । यह अनन्तानन्त भी तीन प्रकारका है - जघन्य अनन्तानन्त, उत्कृष्ट अनन्तानन्त और मध्यम अनन्तानन्त । इनमें से यहां मध्यम अनन्तानन्तको ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि 'जहां जहां अनन्तानन्त देखा जाता है वहां वहां अजघन्यानुत्कृष्ट ( मध्यम ) अनन्तानन्तका ही ग्रहण होता है ' ऐसा परिकर्ममें कहा गया है । आगे कालकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीवोंके प्रमाणका निरूपण करनेके लिये सूत्र कहते हैंअताणताहि ओसप्पिणि उस्सप्पिणीहि ण अवहिरंति कालेण ॥ ३ ॥ "" कालकी अपेक्षा मिथ्यादृष्टि जीव अनन्तानन्त अवसर्पिणियों और उत्सर्पिणियोंके द्वारा अपहृत नहीं होते ॥ ३ ॥ यद्यपि कालप्रमाणकी अपेक्षा क्षेत्रप्रमाणकी प्ररूपणा पहिले करना चाहिये थी, परंतु उसकी जो यहां पहिले प्ररूपणा नहीं की गई है इसका कारण यह है कि क्षेत्रप्रमाण विशेष वर्णनीय है और कालप्रमाण अल्पवर्णनीय है । इसलिये पूर्वमें क्षेत्रप्रमाणकी यहां प्ररूपणा न करके कालप्रमाणकी 1 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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