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छक्खंडागमे जीवट्ठाणं
[ १, १, १७६ अब आहारमार्गणामें सम्भव गुणस्थानोंका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्र कहते हैंआहारा एइंदियप्पहुडि जाव सजोगिकेवलि ति ॥ १७६ ॥
आहारक जीव एकेन्द्रियसे लेकर सयोगिकेवली गुणस्थान तक होते हैं ॥ १७६ ॥
__ यहांपर आहार शब्दसे कवलाहार, लेपाहार, ऊष्माहार मानसिक आहार और कर्माहारको छोड़कर नोकर्म आहारका ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि, इसके सिवाय अन्य आहारोंकी सम्भावना यहां नहीं है।
अब अनाहारकोंके सम्भव गुणस्थान बतलानेके लिये सूत्र कहते हैं --
अणाहारा चदुसु हाणेसु विग्गहगइसमावण्णाणं केवलीणं वा समुग्धादगदाणं अजोगिकेवली सिद्धा चेदि ॥ १७७ ॥
विग्रहगतिको प्राप्त मिथ्यात्व, सासादन और अविरतसभ्यग्दृष्टि तथा समुद्धातगत सयोगिकेवली इन चार गुणस्थानोंमें तथा अयोगिकेवली और सिद्ध जीव अनाहारक होते हैं ॥ १७७ ॥
. ये जीव चूंकि शरीरके योग्य पुद्गलोंका ग्रहण नहीं करते हैं, इसलिये अनाहारक कहलाते हैं ॥ १७७ ॥
॥ सत्प्ररूपणा समाप्त हुई ॥ १ ॥
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