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________________ ४६ ] कहते हैं छक्खंडागमे जीवद्वाणं [ १, १, १४३ अभव्यसिद्धिक जीव एकेन्द्रियसे लेकर संज्ञी मिथ्यादृष्टि गुणस्थान तक होते हैं ॥ १४३ ॥ अब सम्यक्त्वमार्गणाके अनुवाद से जीवोंके अस्तित्वका प्रतिपादन करनेके लिये सूत्र समताणुवादेण अस्थि सम्माइट्ठी खइयसम्माइट्ठी वेदगसम्माइट्ठी उवसमसम्मासासणसम्माट्ठी सम्मामिच्छाइट्ठी मिच्छाइट्ठी चेदि ॥ १४४ ॥ सम्यक्त्वमार्गणाके अनुवाद से सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि, सम्यग्मिथ्यादृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीव होते हैं ॥ १४४ ॥ जिनेन्द्र देवके द्वारा उपदिष्ट छह द्रव्य, पांच अस्तिकाय और नौ पदार्थोंका आज्ञा अथवा अधिगम से श्रद्धान करनेको सम्यक्त्व कहते हैं । वह सम्यक्त्व जिनके पाया जाता है उन्हें सम्यग्दृष्टि कहते हैं । दर्शनमोहका सर्वथा क्षय हो जानेपर जो निर्मल तत्त्वश्रद्धान होता है वह क्षायिकसम्यक्त्व कहा जाता है । यह क्षायिकसम्यक्त्व जिन जीवोंके पाया जाता है उन्हें क्षायिकसम्यग्दृष्टि समझना चाहिये । सम्यक्त्वमोहनीय प्रकृतिके उदयसे जो चल, मलिन और अगाढ श्रद्धान होता है उसे वेदकसम्यग्दर्शन कहते हैं। वह जिन जीवोंके पाया जाता है वे वेदकसम्यग्दृष्टि कहे जाते हैं । जिस प्रकार मलिन जलमें निर्मलीके डालने से कीचड़ नीचे बैठ जाता है और जल स्वच्छ हो जाता है उसी प्रकार दर्शनमोहनीय के उपशमसे जो निर्मल तत्त्वश्रद्धान होता है वह उपशमसम्यग्दर्शन कहलाता है । वह जिन जीवोंके पाया जाता है उन्हें औपशमिकसम्यग्दृष्टि जानना चाहिये । सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतिके उदयसे जो सम्यक्त्व और मिथ्यात्वरूप मिला हुआ तत्त्वश्रद्धान होता है उसे सम्यग्मिथ्यात्व तथा उससे संयुक्त जीवको सम्यग्मिथ्यादृष्टि समझना चाहिये । उपशमसम्यक्त्वके कालमें कमसे कम एक समय और अधिकसे अधिक छह आवली प्रमाण कालके शेष रहनेपर किसी एक अनन्तानुबन्धीका उदय आ जानेसे जिसका सम्यक्त्व नष्ट हो चुका है तथा जो मिथ्यात्व अवस्थाको प्राप्त नहीं हुआ है उसे सासादन सम्यग्दृष्टि कहा जाता है । मिथ्यात्यके उदयसे जिन जीवोंका तत्त्वश्रद्धान विपरीत हो रहा है उन्हें मिथ्यादृष्टि समझना चाहिये । अब सामान्य सम्यग्दर्शन और क्षायिक सम्यग्दर्शनके गुणस्थानोंका निरूपण करने के लिये सूत्र कहते हैं सम्माइट्ठी खइयसम्माइट्ठी असंजद सम्माइट्टि पहुडि जाव अजोगिकेवलि त्ति ॥ सम्यग्दृष्टि और क्षायिकसम्यग्दृष्टि जीव असंयतसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगिकेवली सुणस्थान तक होते हैं ॥ १४५ ॥ अब वेदकसम्यग्दर्शनके गुणस्थानोंका प्रतिपादन करनेके लिये उत्तरसूत्र कहते हैंवेद सम्माइट्ठी असंजदसम्माइट्टि पहुडि जाव अप्पमत्तसंजदा त्ति ।। १४६ ।। वेदकसम्यग्दृष्टि जीव असंयतसम्यग्दृष्टि से लेकर अप्रमत्तसंयत गुणस्थान तक होते हैं ।। १४६ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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