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________________ ८८] छक्खंडागम विवरण किया गया है । गाथासूत्र-द्वारा नामके आदि अक्षरसे उसके पूरे नामको ग्रहण करनेकी सूचना की गई है। यथा- ‘साद ' से सातावेदनीय, 'जस' से यशःकीर्ति, ' उच्च ' से उच्च गोत्र, 'दे' से देवगति, 'क' से कार्मणशरीर, 'ते' से तैजसशरीर, 'आ' से आहारकशरीर, 'वे' से वैक्रियिकशरीर, और ‘मणु ' से मनुष्यगतिका अर्थ ग्रहण किया गया है। इन सब प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभाग उत्तरोत्तर अनन्तगुणित हीन है, इस बातकी सूचना गाथाके पूर्वार्धके अन्तमें पठित 'अणंतगुणहीणा' पदसे दी गई है। ___ नामके आदि अक्षरके द्वारा पूरे नामको ग्रहण करनेकी संकेतप्रणाली भारतवर्षमें बहुत प्राचीन कालसे चली आ रही है । द्वादशाङ्ग श्रुतमें ऐसे संकेतरूप पदोंको ‘बीजपद' कहा गया है। किसी विस्तृत वर्णनको संक्षेपमें कहने के लिए इन बीजपदोंका आश्रय लिया जाता रहा है । कसायपाहुडके मूल गाथा-सूत्रोंमें कितने ही गाथा-सूत्र ऐसे है, जिनके एक एक पद-द्वारा बहुत . भारी विशाल अर्थको ग्रहण करनेकी सूचना गाथाकारने की है और व्याख्यानाचार्योने उसं एक एक पदके द्वारा सूचित महान अर्थका व्याख्यान अपने शिष्योंके लिए किया है। प्रकृतमें कहनेका अभिप्राय यह है कि ऊपर दी गई गाथाको और उसके आधारपर रचे गये अनेक सूत्रोंको सामने रखकर जब हम षट्खण्डागमके समस्त गद्यसूत्रोंपर गहरी दृष्टि डालते हैं और उपलब्ध जैनवाङ्मयके साथ तुलना करते हैं, तो ऐसा कहनेको जी चाहता है कि आचार्य धरसेनने भूतबलि और पुष्पदन्तको जो महाकम्मपयडिपाहुड पढ़ाया था वह इसी प्रकारकी संकेतात्मक गाथाओंमें रहा होगा। इसका आभास धवला टीकाके उस अंशसे भी होता है, जिसमें कहा गया है कि “ इस प्रकार अति सन्तुष्ट हुए धरसेन भट्टारकने शुभ तिथि, शुभ नक्षत्र और शुभ वारमें ' ग्रन्थ ' पढ़ाना प्रारम्भ किया और क्रमसे व्याख्यान करते हुए उन्होंने आषाढ़ शुक्ला एकादशीके पूर्वाह्नमें ' ग्रन्थ ' समाप्त किया । धवला टीकाका वह अंश इस प्रकार है पुणो....... सुट्ठ तुटेण धरसेणभंडारएण सोम-तिहि-णक्खत्तबारे गंथो' पारद्धो । पुणो कमेण वक्खाणंतेण आसाढमास-सुक्कपक्ख-एक्कारसीए पुवण्हे 'गंथो' समाणिदो । (धवला, पृ. १, पृ. ७०) इस उद्धरणमें दो वार आया हुआ 'ग्रन्थ' शब्द और 'वक्खाणंतण' यह पद खास तौरसे ध्यान देनेके योग्य है । ' ग्रन्थ ' शब्दका निसक्ति-जनित अर्थ है--- 'गूंथा गया' शास्त्र । यह गूंथनारूप शब्द-रचना गद्य और पद्य दोनों रूपमें सम्भव है, ऐसी आशंका यहां की जा सकती है। किन्तु कसायपाहुड आदिको देखते हुए और ऊपर-निर्दिष्ट एवं इस षट्खण्डागममें उपलब्ध अनेक सूत्र-गाथाओंको देखते हुए यह निःसंशय कहा जा सकता है कि आचार्य धरसेनको महाकम्मएयडिपाहुडके विशाल अर्थकी उपसंहार करनेवाली सूत्र-गाथाएँ आचार्यपरम्परासे प्राप्त थी, Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600006
Book TitleShatkhandagam
Original Sutra AuthorPushpadant, Bhutbali
Author
PublisherWalchand Devchand Shah Faltan
Publication Year1965
Total Pages966
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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