SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 309
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ पाच. २५ Jain Education Inter पट्टवसु अणुण्णाए तत्तो दुअगावि पट्टवेइति । तत्तो गुरू निसीअइ इअरोऽवि णिवेअइ तयंति ॥ ९५४ ॥ aisa दोsवि विहिणा अणुओगं पट्टविंति उवउत्ता | वंदित सीसो अणुजाणावेइ अणुओगो ॥ ९५५ ॥ अभिमंतिऊण अक्खे वंदइ देवे तओ गुरू विहिणा । ठिअ एव नमोक्कारं कड्डइ नंदिं च संपुन्नं ॥ ९५६ ॥ इअरोऽवि ठिओ संतो सुणेइ पोत्तीइ ठइअमुहकमलो। संविग्गो उवउत्तो अच्चंतं सुद्धपरिणामो ॥९५७॥ | तो कड्डिऊण नंदिं भणइ गुरू अह इमस्स साहुस्स । अणुओगं अणुजाणे खमासमणाण हत्थेणं ॥९५८॥ | दवगुणपज्जवेहि अ एस अणुन्नाउ वंदिउं सीसो । संदिसह किं भणामो? इच्चाइ जहेव सामइए ॥ ९५९ ॥ | नवरं सम्मं धारय अन्नेसिं तह पवेअह भगाइ । इच्छामणुसट्टीए सीसेण कयाइ आयरिओ ॥ ९६० ॥ तिपक्खिणीक तो उवविसए गुरु कए अ उस्सग्गे । सणिसेज्जत्तिपयक्खिण वंदण सीसस्स वावारो ॥ ९६१ ॥ | उवविसइ गुरुसमीवे सो साहइ तस्स तिन्नि वाराओ । आयरियपरंपरएण आगए तत्थ मंतपए ॥ ९६२ ॥ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org
SR No.600005
Book TitlePanchvastukgranth
Original Sutra AuthorHaribhadrasuri
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1927
Total Pages634
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript, Ritual_text, & Conduct
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy