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________________ दिगंबर जैन । ॥१॥ ॥२॥ ॥३॥ (११) ३. उत्तम आर्जव । करके मायाचार, दुर्गति पाता जीव है। होता भवसे पार, आर्जव धर्म प्रभावसे मन-वच-कायाको एक रूप, करे आजैन धर्म कहो अनूप । यह माया-शल्य चुभे सदीव, वा पालन मी वा रहित जीव माया टगनीकी प्रेम-कांत, करवाती तिर्यग्योनि बास । जहां मिलती भू, जल, अनल, काय, वायु व वनस्पतिकाय हाय लट, बिच्छू, शुगर, सर्प, श्वान, मक्खी व ततये भ्रार जान । बिल्ली, खर, बंदर, मैंस, गाय, कर माया इनमें पड़ें नाय अहं निस्य निरन्तर नये त्रास, हैं एक अन्यके बनें ग्रास । रिपर केहरी करता प्रहार, नित खाता बगुला म। मार नित सर्प नकुल का रहे बैर, बिल्ली से चूहों की न खा । चेतन होकर भी जड़समान, कुछ निन-परकी न रहे पिछान यह माया दुखदाई महान, क्यों करते होकर बुद्धिपान् ?। नर-भव नहीं मिलता बार-बार, छल-कपटमें व्यर्थ न करो स्वार . नहिं होता विश्वास, कपटीका इस लोकमें। करते सब सन्मान, ऋजुताधारी जीवका ॥ ७॥ . ॥८॥. ४ उत्तम सत्य । पोलो बचन रसाल, नहिं इसमें हो खर्च कुछ। .. कर्कश शब्द निकाल, जगमें होते निंद्य क्यों ॥१॥ इक देश, सकल वा सत्य पाल, अतिचार सत्यके पंच टाल । मिथ्या उपदेश व कूट लेख, नहीं कहो किसीकी बात देख ॥२॥ हरना तु धरोहर कहा पाप, पर भाशय प्रकट न करो आप। मय-लोम-क्रोधके वशी होय, नहिं मिथ्या भाषण करो कोय ॥३॥ निर्दोष कहो तुम सदा बैन, परको दुखदे, नहिं गिनो चैन । जो जिहा सत्य न कहे बात, मुखमें वह पन्नग सी दिखात १ गघा । २ हाथी । ३ सिंह । ४ मछली । ५ सरल परिणामी। १ झूठी बात लिखना । ७ सर्प।
SR No.543189
Book TitleDigambar Jain 1923 Varsh 16 Ank 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Kisandas Kapadia
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1923
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Digambar Jain, & India
File Size10 MB
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