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________________ NCP दिगंबर जैन (१०) रत्नत्रयकी जगमगे ज्योत, मनमांहि करे है जब उद्योत । मिथ्यात्व-धान्तका करे नाश, चिन्तामणिती जच रहे पास ॥१२॥ असमर्थ करें यदि आय रोप, उनके सन्तव्य तथापि दोष । शशिप्तम शीतल जिनका स्वमाव, वे धन्य नरोत्तम जगतराव ------॥ १३ ॥ जिनके शांति समीप, ऐसे जन इस लोकमें। होते मुक्ति महीप, जगत-पूज्य होकर सदा ॥ १४ ॥ २. उत्तम-मार्दव । मान नशे में भूल, गिने बडा जो आपको । अपने पथमें शूल, बोता अपने हाथ से ॥१॥ कुलसे हूं उन्नत, रूपवान, धन है मेरे, मैं बल-ध । । विद्यासे उन्नत तपोवान, हूं जाति-समुन्नत, सर्वरेमान ॥ २ ॥ भगमें मेरा ऐसा प्रभाव, दरवाजे आते रंक-राव । होता जिसपर मेरा प्रकोप, मानो उसका तुम हुआ लोप इस मांति नशेमें होय मस्त, निन-जीवन करता अप्रशस्त । चक्रीका मी नहिं रहा मान, कब कौन हुआ इसका न ध्यान यह अचेला चलती नहीं साय, जाते सब अंत पसार हाथ । इस भुपैर बहुते गये होय, वे धन्य, जु भाको गये खोय ॥५॥ कुल, जाति, परिग्रह, धन, व रूप, नहिं चेतनके हैं ये स्वरूप । पर द्रव्योंका अमिमान त्याग, नित बारम-गुणों में करो राग ॥६॥ त्रप्तकी थावरसे लही काय, तिसपर मी न मिळी आय । खोवो मत मान-कषाय मांहि, यह रत्न गया फिर मिले नाहि मानीसे सब ही रहे रुष्ट, मा, बाप व माई कहें दुष्ट । गुरु-नन मी करते नहीं प्यार, धिक्कार हैं सब बार-बार ॥८॥ इस कारण छोड़ो मान, मित्र ! चितपर मृदुताका करो चित्र । तिहुँ लोकमें मृदुता कही सार, कर देती मासे शीघ्र पार ॥९॥ करके मान कषाय, जो नहिं जीते जा सकें। छूते आकर पाये मार्दव, धर्म प्रभावसे ॥ ॥१०॥ १ अन्धकार । १ क्रोध । ३ क्षमा करने योग्य । १ राना । ५ पृथ्वी । ६ मनुष्यपना ।
SR No.543189
Book TitleDigambar Jain 1923 Varsh 16 Ank 11
Original Sutra AuthorN/A
AuthorMulchand Kisandas Kapadia
PublisherMulchand Kisandas Kapadia
Publication Year1923
Total Pages36
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Digambar Jain, & India
File Size10 MB
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