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अनेकान्त/२८
हुए छोटे-छोटे दोष आते हैं तथा इनका आचार्य के पास आलोचना करने पर अथवा स्वयं प्रायश्चित्त ग्रहण कर लेने पर शोधन भी हो जाता है। कभी-कभी कहीं-कहीं बड़े दोषों को भी आचार्यों ने अतिचारों में दिखाया है। ___ अनर्थदण्डव्रत के पाँच अतिचार हैं३५-१. कन्दर्प-हास्ययुक्त अशिष्ट वचनों का प्रयोग करना, २. कौत्कुच्य-शारीरिक कुचेष्टापूर्वक अशिष्ट वचनों का प्रयोग करना, ३. मौखर्य-निष्प्रयोजन बोलते रहना या बकवाद करना, ४ असमीक्ष्याधिकरण-प्रयोजन के बिना कोई न कोई तोड़-फोड़ करते रहना या काव्यादि का चिन्तन करते रहना तथा ५. उपभोगपरिभोगानर्थक्य-प्रयोजन के न होने पर भी भोग-परिभोग की सामग्री एकत्र करना। ____पं. आशाधर जी ने सामारधर्मामृत की स्वोपज्ञ ज्ञानदीपिका' पञ्जिका में पाँच अतिचारों की व्याख्या की है, जिसका भाव इस प्रकार है। जो वचन काम-विकार को उत्पन्न करने वाले होते हैं या जिनमें उसी की प्रधानता होती है, उन वचनों के प्रयोग को कन्दर्प कहते हैं। कन्दर्प का अर्थ है-राग की तीव्रता से हंसीयुक्त असभ्य वचन बोलना। भौंह, ऑख, ओष्ठ, नाक, हाथ, पैर और मुख के विकारों के द्वारा कुचेष्टा के भाव को कौत्कुच्य कहते हैं। अर्थात् हास एवं भांडपने के साथ शारीरिक कुचेष्टा कौत्कुच्य है। ये दोनों प्रमादचर्या अनर्थदण्डव्रत के अतिचार हैं। . _ बिना विचारे यद्वा-तद्वा बोलने वाले को मुखर कहते हैं और मुखर का भाव मौखर्य है। अर्थात् ढिठाईपूर्वक असत्य एवं असंबद्ध बकवाद करना मौखर्य है। यह पापोपदेश अनर्थदण्डव्रत का अतिचार है। क्योंकि मौखर्य से ही पापोपदेश होना संभव हो पाता है।
आवश्यकता का विचार किये बिना अधिक कार्य करना असमीक्ष्याधिकरण नामक अतिचार है। जैसे चटाई बनाने वाले से अनेक