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53/3 अनेकान्त/31
15. भक्तामर स्तोत्र, 22. 16. वही, 3 17. वही, 4-5 18. 'अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम
त्वद्भक्तिरेव मुखरीकरुते बलान्माम। यत्कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति
तच्चाम्रचारुकलिका निकरैकहेतुः ।।-भक्तामर-स्तोत्र, 6. 19. वही, 10. 20. वही, 13, 16, 17 तथा द्रष्टव्य 18, 19. 21. 'ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरिहरादिषु नायकेषु। तेजो महामणिषु याति यथा महत्त्वं, नैवं तु काचशकले किरणाकुलेऽपि ।। मन्ये वरं हरिहरादय एव दृष्टा दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति। किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य. .
कश्चिन्मनो हरति नाथ । भवान्तरेऽपि।। भक्तामर, 20-21. 22. वही, 24. 23. वही, 25.
व्यवहार नय
व्यवहारानुकूल्यात्तुतु . प्रमाणानां प्रमाणता। नान्यथा बाध्यमानानां ज्ञानानां तत्प्रसङ्गतः।।
-श्रीमद्भट्टाकलंक, लघीयस्त्रयादिसंग्रहः पृ-90 -व्यवहार के अनुकूल होने से ही प्रमाणों की प्रमाणता स्थापित है, अन्यथा नहीं। यदि ऐसा न हो तो जो संशय आदि ज्ञान बाध्यमान होते हैं (जिनकी प्रमाणता में बाधा आती है) वे भी प्रमाण हो जावेंगे।