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________________ चन्देलकालीन मदनसागरपुर के श्रावक :) प्रो. यशवंत कुमार मलैया मक ई० ८८४ में ग्राम दहकना में एक प्राचीन जैन कोतिवर्मन : स० ११३२-११५४ (ई० १०७५मन्दिर के खंडहर प्राप्त हुए थे। खुदाई से इसके आस- १०६७) पाम अन्य चत्यो के अवशेष भी मिले थे। यह स्थान आज जयवर्मन · स. ११७३ (ई. १९१६) पुन : विकसित होकर अहार नीर्थ क्षेत्र के नाम से विख्यात मदरवर्मन : सं० ११८६-१२२० (ई. ११२६है। इस स्थान के ऐतिहासिक महत्व को पहचाना नही गया है। बुन्देलखड में ही नही, मम्पूर्ण भारत में सभवन: परमादि · म० १२२६-१२५८ (ई० ११६६-१२०९ कोई अन्य स्थान नही है जहाँ ग्यारहवी से तेरहवी सदी लोक्यवर्मन : स. १२६१-१२९८ (ई. १२०४ १२४२) के बीच इतनी दूर-दूर मे श्रावको ने आकर प्रतिष्ठा कराई वीरवर्मन : स०१३११-१३४२ (ई०१२५४. हो। यहां प्राप्त लेखो से न केवल श्रावको की न्यातो १२८५) (त्वयो) के इतिहास पर प्रशि पड़ता है बल्कि चंदेल मीजवर्मन स० १३४५-१३४६ (ई०१२८८राजवणो मे हा उतार-चढ़ाव के मी प्रमाण मिलते है। १२८६ । जैन साधुओ को एक निकाय के बारे में भी पता चलता हम्मीरवर्मन : स० १३४६-१३६५ (ई० १२८६है कि जिस पर अभी कोई अध्ययन नही हया है। १९०८) गहलोत (गिसोदि) कुल की तरह चदेल भी वीरवर्मन (दूमरे). स. १३७२ (ई. १३१५) ब्रह्म त्रिय थे। यह वश नवमी शती के मध्य उतान्न हा और इनका राज्य किसी न किसी रूप मे १४यी गड, विद्याधर, विजयपाल, सल्लक्षणवर्मन, पृथ्वीशताब्दी के आरम्भ तक चला। पहले ये प्रतिहारो के . न वमन व यशोवर्मन के समकालीन उल्लेख नही मिले है। भाडलिक थे, दसवी शती मे यशोवर्मन ने स्वतन्त्र राज्य वर्तमान अहार का प्राचीन नाम मदनसागरपुर था। स्थापित किया । नवमी सदी मे हए जयशक्ति या जेजा के यह नाम मदनवर्मन क शासन काल म दुआ । स० १२०६ नाम पर इनका राज्य जेजामुक्ति या जजहुति कहलाता के एक लेख में यह नाम है। मदनवर्मन के पूर्व की भी था। इनकी राधानी पहले खजुराहो थी, बाद मे महोबा दो प्रतिमाये (स० १.२३ व स० ११३१) यहाँ हैं। सं० मे हुई। खजुगहो को कभी मुसलमानो ने नही जीता. १३३२ तक की प्राचीन प्रतिमाये यहाँ है। सं० २०१४ अत: यहाँ के बहुत से मन्दिर आज भी खड़े हैं। (ई. १९५८) मे यहाँ पुनः प्रतिष्ठायें हुई थी। सं० अलग अलग लेखको ने चन्देल राजाओ के राज्य. १५२४ से स १८६६ की प्रतिमाये भी यही है, पर वे काल के अलग अलग अनुमान लिखे है नीचे लिखे अन्यत्र से लाई गई मालभ होती है। राजाओ के ताम्रशामन या समकालीन उल्लेख शिला म. ११२३ व १५३, की प्रतिमाओ की प्रतिष्ठा लेखों मे प्राप्त हए हैं। प्राप्त लेखो के सवत दिए किसके राज्यका न मे हुई यह घर नही है। देववर्मन के सिंहासन पर बैठने के बाद कनी चेदि के नलचुरिवश के धग : मं०१०११-१०५६ (ई० ५५४-१००२) लक्ष्मीर्ण (या कणं ने आक्रमण करके चदेलों के राज्य देववर्मन : स. ११०७-११०८ ई० १०५०-१०५२) के बडे भाग पर अधिक र कर लिया। सभवत. देव
SR No.538046
Book TitleAnekant 1993 Book 46 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1993
Total Pages168
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size7 MB
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