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________________ दिगम्बर साधु को मोर-पिच्छो ? पचन्द्र शास्त्री, संपादक 'अनेकान्त गत दिनों हमें एक पत्र मिला है और हमारा ध्यान के अपरिग्रहत्व गुण का ख्यापन करते हैं। सर्वथा अपरिइस ओर आकर्षित किया गया है कि क्या मयूर पिच्छी ग्रही होने के कारण ही दिगम्बर साधु में अहिंसादि महावत धारण करने से वर्तमान दिगम्बर साधु-साध्वियों का हिसा फलित होते हैं। यदि ऐसा न होता और अपरिग्रह की के व्यापार में योगदान नहीं ? उपेक्षा कर अहिंसा आदि को प्रधान-धर्म माना गया होता लेखक ने हमें 'The Illustratad weekly of तो आचार्यों ने पूर्ण दिगम्बरत्व में ही अहिंसादि महावतों India. oct. 15, 1989 का वह पृष्ठ भी भेजा है का ख्यापन न किया होता अर्थात उन्होने परिग्रहियो में जिसमे 'Maneka Gandhi calls for a ban on भी अहिंसा आदि महावतों के हो जाने का विधान कर the wanton Killing of our national bird, दिया होता? पर, ऐसा किया मही गया है। जब भी The pecook for the export of its Feathers' महावत होंगे-सदा पूर्ण अपरिग्रही में ही होंगे। फलतः लेख छपा है। --मूल धर्म अपरिग्रह ही है और दि० साधु इसी रूप मे उक्त लेख को पढ़कर हम सिहर उठे कि ऐसी होते हैं-वे अपने पास तिल-तुष मात्र बाह्य और रागादिनिर्दयता से भी मयूर पंख प्राप्त किए जाते हैं क्या ? रूप अन्तरग परिग्रह नही रखते। भावपाहड में दि० साधु यदि ऐसा है तो हमारा कर्तव्य है कि हम महाव्रती के विषय में कहा है-- मनियों को तो हिंसा में निमित्त कारण होने से बचाएं, "णिग्गंथा णिस्संगा णिम्माणासा अराय णिहोसा । आदि । हम उक्त अंग्रेजी लेख पाठकों की जानकारी के णिम्मम णिरहंकारा पन्वज्जा एरिसा भणिया ॥४॥ लिए अनेकान्त के पष्ठ १९-२० पर दे रहे हैं। तिलतुसमत्तणिमित्तसम वाहिरगंथ संगहो णत्यि' ॥५५॥ उक्त लेख के प्रसंग से हमने उचित समझा कि पिच्छी प्रवज्या-निर्ग्रन्यस्वरूप, परिग्रह से रहित, मानपर कुछ चितन दिया जाय। क्योकि जब आज मुनिगण रहित, आशा से रहित, राग-द्वेष से रहित, ममत्वभाव सैकड़ों (शायद वे ५००-१००० तक भी होते हों) पिच्छो रहित और पर कर्तृत्व के अभिमान से रहित होती है। (पंखों की पीछी रखते है और श्रावक उन्हें पीछो देते उसमें बाह्य रूप में भी तिल-सुष मात्र परिग्रह नही होता । हैं, तब इतने अधिक मयूर पखों को उपलब्धि के तरीके साधु के पूर्ण अपरिग्रह रूप में होने पर वह स्वयं काप्रश्न सहज ही उठ जाता है कि क्या मयूर पंखों को में अन्य पाप-जनक सभी दोषों से बचा रहता है परश्रावक स्वयं बीनकर लाते है या बाजार से खरीदते हैं ? उसकी शारीरिक हमन-चलन आदि क्रियाओं में अन्य क्योकि वर्तमान साधु तो बस्तियों के रहने मे अभ्यस्त हैं, जीवों की विराधना से नहीं बचा जा सकता-सूक्ष्म जीवों वे पख कैसे ला सकेगे. आदि। पिच्छी पर चिंतन देने से के घात की सम्भावना नही रहती है। फलतः उस सम्भापहिले हम यह और ग्पष्ट कर दें कि दिगम्बर साधु को वना के निवारण हेतु शास्त्रों मे साधु को मयूर पिच्छी पीछी अनिवार्य क्यों है - जबकि वह सर्वथा अपरिग्रही हैं? रखने का विधान किया गया है और मयूर पिछी को जैसे पिता से उत्पन्न पुत्र अपने पिता के पितृत्व गुम परिग्रह संज्ञा से मुक्त रखकर उसे अकरण को सज्ञा दी का ख्यापन करता है -पितृत्व गुण को पुष्ट करता है, गई है। पिच्छी उपकरण इसलिए है कि उससे जीवों का वैसे ही अपरिग्रह से फलीभूत अहिंसा आदि भी अपरिग्रही प्राणरक्षणरूप उपकार होता है।
SR No.538042
Book TitleAnekant 1989 Book 42 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1989
Total Pages145
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size7 MB
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