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मोम् महम्
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परमागमस्य बीजं निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम् । सकलनविलसितानां विरोधमयनं नमाम्मनेकान्तम् ॥
वर्ष ३८
बीर-सेवा मन्दिर, २१ दरियागंज, नई दिल्ली-२
वीर-निर्वाण सवत् २५११, वि० स० २०४२
जुलाई-सितम्बर
१९८५
भव-दुख वेगि हरो प्रभु जी तुम प्रातम ध्येय करो॥ सब जग जाल तने विकलप तजि, निज सुख सहज वरो ॥ प्रभुनी... हम तुम एक द्रव्य दृष्टि से, पर यह भेद परो॥ भेद ज्ञान बल तुम निज साधो, हम विवेक विसरो॥ प्रभुजी... तुम निज राच लगे चेतन में, पर से नेह टरो। हम सम्बन्ध कियो तन धन से, भव वन विपति भरो ॥ प्रभुजी... तुम री प्रातम सिद्ध भई प्रभु, हम भव बन्ध धरो। या ते भई अधोगति हमरी, मव दुख अगनि जरो ॥ प्रभुजी... देखि तिहारी शांति छवि को, हम यह जान परो। हम हूं तुम सम होय सकत हैं, अब यह जान परो ॥ प्रभुजी... तुम निमित्त मम शक्ति प्रगट हो, निज अनुभवन सरो। मेरे तो बस देव तुम्ही हो, तुम सम और न कोई ॥ प्रभुजी... वर्शन मोह हरी हमरी मति, तुम लख सहज टरो। "चम्पा" शरण लई अब तुमरी, भव दुख वेगि हरो ॥ प्रभुजी...