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अनेका
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उनकी सेवा करनी होगी। हमारे देखते २ हमें याद है कि किन्हीं दिनों सप्तम प्रतिमाधारी का जो सम्मान था, वह कदाचित् आज साधारणतः मुनि को भी दुर्लभता से प्राप्त है । पहिले लोग जहां किसी ब्रह्मचारी त्यागी के आगमन की खबर सुनते थे वे बासों उछल पड़ते थे, भक्तिभाव से उनकी अगवानी करते थे, श्रद्धावनत हो भक्तिभाव से उनके प्रवचन सुनते थे और उनकी वैयावृत्त करते थे और इसमें उनकी पूरी दृष्टि स्व-सुधार में केन्द्रित रहती थी । अत्र आज सारा का सारा वातावरण बदला हुआ है। लोग जो कुछ भी करते हैं उसमें पर-सुधार का लक्ष्य और प्रचार का दिखावा ही मुख्य होता है। गोया, धर्म आज केवल प्रचार और पर-सुधार का माध्यम बन गया । उसमें विचार और स्व-आचार नाम की कोई चीज ही नहीं रही। जबकि वास्तव में धर्म, प्रचार की चीज न हो, आचार की ही चीज है ।
आज लोगों के लिए 'लोग क्या कहेंगे' यह प्रश्न भी मुख्य आड़े आ गया है । वे सोचते हैं-यदि हम ऐसा करेंगे या न करेंगे तो लोग क्या कहेंगे? बस, वे लोगों को तुष्ट करने के ख्याल से, प्रचार को माध्यम बना मैदान में कूद पड़ते हैं और लोग समझ लेते हैं कि अमुक बहुत अच्छा काम कर रहा है । आखिर क्यों न समझें ? आज तो प्रचार का जमाना है, सो हो ही रहा है । पर याद रहे — 'लोग क्या कहेंगे ?' यह प्रश्न लोगों के सामने पहिले भी था और वे इसे हल भी करते थे । अन्तर मात्र इतना है कि तब वे इसे हल करने में प्रचार को माध्यम न बना, स्व-आचार-विचार को माध्यम बनाते थे-अपने में सुधार लाते थे। जबकि आज प्रचार को माध्यम बनाया जा रहा है। स्मरण रहे कि प्रचार और आचार में बड़ा भेद है । प्रचार तो आज सरकार भी करती है- 'शराब जहर है मत पियो ?' पर, सरकार का वैसा आचार न होने से इस प्रचार का लोगों पर कुछ असर नहीं होता। सभी को मालूम है कि शराब की बिक्री सरकार के दिये हुए ठेकों की मार्फत सरकार द्वारा ही होती है और शराब बन्दी का प्रचार भी सरकार ही करती है। इससे मिलती-जुलती
बात ही बीड़ी-सिगरेट आदि के निर्माता भी करते हैं। आदि ।
यदि हमें श्रावकाचार वर्ष मनाने की वास्तविक ललक है तो हमें स्वयं को श्रावकाचार रूप में ढालना होगा । हमें अपने, अपने परिवार के, गली-मुहल्ले और नगर के वन्धुओं को पहले श्रावक बनाना होगा — उन्हें धर्म के आचार पालन के लिए तैयार करना होगा। हम बात करते हैं सम्प्रदाय, सारे देश और विश्व को सुधारने की, जबकि अपने सुधार की हमें सुध ही नहीं। हमने उन बहुत सी भीड़ों को भी कई बार देखा है जिनमें भाषणों से प्रभावित होकर समुदाय के समुदाय हाथ ऊंचे उठाकर शराब और मांस जैसे अन्य बहुत से हेय पदार्थों के सेवन न करने का दृढ़ संकेत देते रहे हैं और बाद में ललक उठने पर नियम- च्युत हो गए हैं। हमने ऐसे जैनों को भी देखा है जो किन्हीं महाराज को आहार देने के लिए आजन्म शूद्र जल त्याग का नियम लेकर बाजार में हलवाई की दुकान पर कचौड़ी आदि खाकर कहते रहे हैं कि हमने तो शूद्र जस मात्र का त्याग किया है-अन्य चीबों का नहीं, आदि। गरज मतलब यह कि कुछ लोग दीर्घकालीन व्यसनी होने से और कुछ कानूनी दांव-पेंचों का सहारा लेकर भ्रष्ट होते रहे हैं। अतः नियम देने-लेने और उन पर दृढ़ रहने व रखने के लिए पहिले उनकी चित्तभूमि को बारम्बार उसी भांति तैयार करते रहना पड़ेगा जैसे चतुर किसान बीज बोने से पहिले खेत को भलीभांति तैयार करता है। बाद में फसल की देख-भाल की भांति लोगों को पुनः पुनः सम्बोधन भी देना होगा । उनकी देखभाल भी करनी होगी। अब जरा सोचिए ! हममें वैसे चतुर किसान कितने हैं और वैसी भूमि कम किसने तैयार कर रखी है। कहीं ऐसा तो नहीं हो कि मेघ ऊपर जमीन में बरस रहा हो और हम किसान भी बनाड़ी हों मात्र लोगों में 'कृषक' नाम कायम रखने के लिए ही हल चला रहे हों यानी - शुद मियां फजीहत दीगरी मसीहत ।'
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-सम्पादक