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णायकुमारचरिउ की सूक्तियाँ और उनका अध्ययन
D. कस्तूरचना 'सुमन'
हिन्दी साहित्य में "बिहारी सतसई के सम्बन्ध में कर्णप्रिय हो । संक्षिप्त होना भी आवश्यक है। सूक्तियों में विद्वानों की ऐसी मान्यता है कि सक्सई के दोहे देखने में संक्षिप्तीकरण तो होता ही है। इसके अतिरिक्त वे हितैषी, तो डोटेलते हैं किन्तु माविकके तीर के समान वे गंभीर मनोहारी और कर्णप्रिय भी होती हैं। अतः इस व्याख्या के सार करते है। प्रस्तुत सूक्तिरी सतसई के दोहों को बालोक में कहा जा सकता है कि वे "यथा नाम तथा 'बोना कहीं अधिक छोटी और अधिक अर्ष-गाम्भीर्य लिए गुण" कहावत को चरितार्थ करती हैं। हवे हैं। यदि हम यह कहें कि उनमें अर्थ-गाम्भीर्य बसा ही पुराणों में सूक्तियों को सुभाषित कहा गया है तथा दिखाई देता है, जैसा कि तत्वार्थ सूत्र के सूत्रों में तो कोई रन भी। सुभाषित शब्द की शाब्दिक व्युत्पत्ति की जाये - अतिशयोक्ति न होगी।
तो सुभाषित और सूक्ति दोनों के अर्थ ससान ही ज्ञात होते सूक्तियों में लोक हितैषी भावनाएं दिखाई देती हैं। है। बतः सुभाषित और सूक्ति दोनों अर्थ साम्य होने से विशिष्ट अनुभव, चिन्तन और मनन के उपरान्त ही ये सुभाषित-सूक्ति का पर्यायवाची कहा जा सकता है। 'रत्न' किसी पटना विशेष या कपन के निष्कर्ष रूप में कही गयी कहा जाना बहुमूल्यत्व का प्रतीक है। सूक्तियाँ है भी रत्न प्रतीत होती है। सममें शाश्वत् सत्य उद्घाटित किए गये के समान बहुमूल्य, क्योंकि वे अनुभव के बाद कही जाती हैं। संक्षेप में होगा उबका विशिष्ट गुण है। सूक्तियों से है, जो अनुभव बहुसमय एवं कष्ट साध्य होता है। पुराणों नवचेतना जागृत होती है, अस्थिरता स्थिरता में परिणत और चरित काव्यों में ऐसे रल भरे पड़े है किन्तु प्राप्त हो जाती है।
उन्हें ही होते हैं जो ऐसे काव्य-सागर में गोता लगाने में सूक्ति शब्द की शाब्दिक व्युत्पत्ति से भी यही अर्ष सिद्धहस्त हैं। प्रतिफलित होता है। सूक्ति-सु+उक्ति से निर्मित है। सुभाषितों को मन्त्र ही नहीं महामन्त्र भी कहा गया सुका बर्ष है सुष्ट बच्छा और उक्ति का अर्थ है कथन । है। परन्तु वे ऐसे मन्त्र हैं जिनका प्रयोग कवि ही कर इस प्रकार इस व्युत्पत्ति के अनुसार सूक्ति का अर्थ है सकता है। ऐसे मन्त्रों से दुर्जन पुरुष भूतादि ग्रहों के अच्छा कपन, और अच्छा कथन वही कहा जा सकता है समान प्रकोप को प्राप्त होते हैं। मत्रों और सुभाषितों के जिसका बोता पर प्रभाव पड़े निा नही रहे । श्रोता उसी प्रयोगकर्ता यद्यपि भिन्न-भिन्न हैं परन्तु अन्य तथ्यों में (जैसे कवन से प्रभावित होता है जो हितकारी, मनोहारी और मनोहारिता, कर्णप्रियता, हितैषीपना और सक्षिप्तीकरण)
१. सतसइया के दोहरे ज्यों माविक के नीर । : देखत में छोटे-लगें घाव करें गम्भीर ।। २. यथा महाध्य रत्नानां प्रसूतिमंकराकरात् ।
तथैव सूक्तरलानां प्रभवोऽस्मात्पुराणतः॥ 'सुर्दुलं यवन्यत्र चिरादपि सुभाषितम् । 'सुलभ स्वरसंग्राह्य तदिहास्ति पदे-पदे ॥
-प्राचार्य जिनसेन, महापुराण : २, ११६ और १२२
३. महापुराण पपपुराण और वीवर्धमानचरित में क्रमश:
७६२, १००० और १११ सूक्तिरन अब तक प्राप्त
हो चुके हैं। ४. सुभाषितमहामन्त्रान् प्रयुक्तान्कविमन्त्रिभिः । श्रुत्वा प्रकोपमायान्ति दुर्घहा इव दुर्जनाः ॥
-महापुराण : वही; १,८८ ५. जुआ खेलना मांस मद वेश्या व्यसन शिकार। .
चोरी पररमणी-रमन सातों व्यसन निवार ॥