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________________ पट्टा मादेवी भातला गुणगणननूना, विबेयमूर्ति, सर्वकलान्विता, पंचलकार- इतने अधिक एवं अर्थगांभीर्यपूर्ण विशेषण अन्य किसी पंचरलयुक्ता, (ललितकलापंचकयुक्ता), संगीतविधा- नारीरल के लिए साहित्य या शिलालेखादि में प्रयुक्त सरस्वती, गीतावधनृत्यसूत्रधारा, संगीतसंगतसरस्वती, नही हुए। हम 'श्री नागराजरावजीते पूर्णतया सहमत है विचित्र नर्तनप्रवर्तन-पात्रशिखामणि, भारतागमद-तिरुले- कि महादेवी शान्तला में निश्चित ही ये योग्यताएं रही निसलुभय-क्रमनृत्यपरिणता, भरतागमभवननिहित-महा- होंगी। यदि एक ही शब्द में उस सर्वगुण सम्पन्ना सुलक्षणा नीयमतिप्रदीपा इत्यादि । विरदों द्वारा हुआ है। पतिव्रता- तेजोमूर्ति का परिचय दिया जाय तो उसके लिए 'जगतीप्रभावसिडसीता, अभिनवरुक्मिणीदेवी, पतिहितसत्यभामा, मानिनी' विशेषण की उपयुक्तता असंदिग्ध है। उपरोक्त में अभिनवारुंधति, पतिहितव्रता, विष्णुनुपमनोनयनप्रिया, से अधिकाश प्रशस्तिवाक्य श्रवणबेलगोल में स्वयं उस महाविष्णुवर्द्धनङ्गगदचित्तवल्लभलक्ष्मी,सौभाग्यसीमा, अनवरत. देवी द्वारा निर्मापित अति भव्य जिनालय "सवतिगंधवारणपरमकल्याणाभ्युदयशतसहस्त्रफलभोगभागिनी-द्वितीयलक्ष्मी, बसति" में प्राप्त शिलालेख में अंकित हैं और यह प्रशस्ति विष्णुवर्द्धनपोयसलदेवर-पिरियरसि पट्टमहादेवी- उसके उक्त महादेवी के दिवंगत होने के उपरांत अंकित की गई पातिवत्य, अनन्यपतिप्रेम और सौभाग्य के सूचक विशेषण थी-कविवर पं० बोकिमस्य उसके रचयिता थे और हैं। साथ ही, वह निजकुलाभ्युदयदीपिका, परिव, रफलित- संगीत-नाट्य-शिल्पाचार्य गंगाचारि ने उसे उत्कीर्ण किया कल्पितशाखा थी तो सोसिगंधहस्ति या गुद्वतंसवतिगंधवारण था। वे दोनों महानुभाव शान्तला के शैशवावस्था से ही भी थी। यह शुद्धचरित्रा, विशुद्धप्राचारविमला, व्रतगुण- शिक्षक एवं अध्यापक रहे थे । महादेवी के धर्मगुरु मूलसंघशीला, व्रतगुणशीलचरित्रान्तःकरण, मुनिजनविनेयजन- कोण्डकुन्दान्वय-देशीगण-पुस्तकमगच्छ के आचार्य मेषचन्द्र विनीता, विनयविनमद्विलासिनी, दयारसामृतपूर्णा, अचिन्त्य- विद्य के सुशिष्य आचार्य प्रमाचन्द्र सिद्धान्तदेव थे। शील, अनूनदानाभिमानी, सकलवन्दिजन चिन्तामणि, लगभग दो मास पूर्व हमे इस उपन्यास की प्रति प्राप्त सकलसमयरक्षामणि, भव्यजनहितवत्सला, सर्वजीवहिता, धीमे चार-ta सर्वमपितियता, जिनधर्मनिर्मला, आहारमयभेषज-शास्त्र- फिर भी तपि फिर भी तृप्ति नहीं होती। बड़ा अच्छा लगा-पुनः पुनः दान-विनोदा, भुवनकदानचिंतामणि, जिनगंधादकपवित्री पढ़ने की इच्छा होती है । निस्सन्देह यह क्लासिकल कोटि तात्तमांगा, जिनधर्मकथा प्रमोदा, पुण्योपार्जनकरणकारणा की अति श्रेष्ठ कृति है। लेखक अनुवादक एवं सभी साधुजिनसमयसमुदितप्रकारा, चतुस्समयसमुद्धरण-करणकारणा, वाद के पात्र हैं उपन्यास के द्वितीयादि भागों की उत्सुकता सम्यक्त्वचडामणि आदि उपाधियों से विभूषित महिमामयी के साथ प्रतीक्षा रहेगी। विष्णुपिदमभूमिदेवते, रण व्यापार दोल बलमदेवते, जनक्कलपुज्यदेवते, विद्येयोलवाग्देवते, सकलकार्योदोगदोल -ज्योति निकज, मन्त्रदेवते के रूप में लोककविख्यात हुई । चार बाग, लखनऊ-१९ हमी अपनी शान्ति के बाधक हैं। जितने भी पदार्थ संसार में हैं उनमें से एक भी पार्ष बारपाव का बाधक नहीं। बर्तन में रक्खी हुई मदिरा अथवा डिब्बे में रक्खा हुआ पान पुरुषों में : विकृतिका कारण नहीं। पदार्थ हमें बलात् विकारी नहीं करता, हम स्वयं मिथ्या विकल्पों से उसमें इष्टानिष्ट कल्पना कर सुखी और दुखी होते हैं। कोई भी पदार्थ न तो सुख देता है और न दुःख देता है इसलिए जहाँ तक बने आभ्यन्तर परिणामों की विशुद्धि पर सदैव ध्यान रखना चाहिए। ' -वर्णी-वाणी
SR No.538037
Book TitleAnekant 1984 Book 37 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmachandra Shastri
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1984
Total Pages146
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size8 MB
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