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________________ २६, कि.४ लिखा है कि उनको केवलज्ञान हुए बाव में भगवान् की यहां 'जामी' शब्द का प्रयोग किया है जिसका संस्कृत सभा में गये। टिप्पणकार ने भगिनी (बहन) प्रर्य किया है। इस तरह ३. बाहुबली के नगर का नाम कच्छ महाकच्छ भगवान् ऋषभदेव के साले लगे यह सिद्ध महापुराण, पपपुराण, हरिवंशपुराणादि में "पोदनपुर" होता है। कोशग्रन्थों में 'जामी' शब्द का अर्थ पूत्री भी लिखा है। किन्तु पउमरिय में तक्षशिला लिखा है । यही दिया है। तदनुसार पुष्पदन्त ने अपभ्रश महापुराण के हेमचन्द्र ने भी लिखा है। प्रथम खण्ड पृ० ६२ पोर २५५ में भगवान् की राणियो ४. भरत बाहुबली के युद्धों का नाम को कच्छ महाकच्छ को पुत्रियां बताई हैं। हरिवंशपुराण महापुराणादि में दृष्टियुद्ध, जलयुद्ध पौर बाहयुद्ध ये मोर पपपुराण इस विषय में मौन है। भगवान की दीक्षा तीन युद्ध लिखे हैं। किन्तु पउमचरिय में दो ही युद्ध लिखे के साप ही कच्छ महाकच्छ ने भी दीक्षा ली थी अतः ये है-वृष्टियुद्ध और मुष्टियुट । पपपुराण में ये दो लिख- भगवान के समवयस्क होने से भगवान की रानियां इनकी कर पादिशब्द दे दिया है। हेमचन्द्र ने तीन लिखे हैं। बहनें थीं यह मानना हो संगत बैठता है। पुत्रियां मानने से ५. ऋषभदेव की राणियों के नाम तो इनकी उम्र नाभिराजा के तुल्य होगी। जो ठीक नहीं है। महापुराण में यशस्वती भोर सुनन्दा ये दो राणियां ९. श्रेयांस किसका पुत्र था? बताई है। पउमपरिग और श्वे० ग्रन्थों में सुमंगला मोर हेमचन्द्राचार्य ने श्रेयांस को बाहवली का पोताव भन्दा नाम दिये हैं। पपपुराण पोर हरिवशपुराण तथा सोमप्रभ का पुत्र लिखा है। पउमरिय के पचम उद्देश्य पउमचरित में नंदा सुनंदा दिये हैं। पद्मपुराण पर्व २० में सोमवंश की उत्पत्ति बताते हुए लिखा है कि-बाहइलोक १२४ में भरत की माता का नाम यशोवती भी बली के पुत्र सोमप्रभ से सोमवश का प्रारम्भ हमा है। लिखा है। किन्तु सोमप्रम के बाद श्रेयास का नाम नही लिखा है। ६. ऋषभदेव के पुग्म-पुत्र पउमचरिय, पपपुराण, हरिवंशपुराण तीनो मे सोमवश हरिवंशपुराण पर्व लोक २१-२२ में भरत पोर की उत्पत्ति बाहुबली के पुत्र सोमयश प्रयवा सोमप्रभ से नाही का तथा बाहबली और सुन्दरी का युगल जाम बताई है और सोमप्रभ का पुत्र महाबल लिखा है किन्तु लिखा है। वे ग्रंथों में लिखा है कि- ऋषभदेव की एक महापुराण में सोमवंश नाम का कोई वंश ही नहीं बताया राणी तो बहो थी जो ऋषभ के साथ ही जन्मी थी भोर है। इसी से वहां "बाहुबली ने दीक्षा लेते वक्त राज्य अपने दूसरी राणी किसी दूसरे युगलिया के साथ पंदा हईपी। पुत्र महाबल को दिया" ऐसा लिखा है। इससे जाना जाता युगलिया के मरने के बाद उसे ऋषभदेव ने अपनी रानी है कि-महापुराण के मतानुसार बाहुबली के सोमप्रभ बनाई थी। उनसे भरत और ब्राह्मी व बाहवली पोर नाम का कोई पुत्र ही न पा । महावल नाम का पुत्र था। सुन्दरी को युगल जम्म तथा शेष ९८ पूत्रों के भी युगल- इस प्रकार इन अनुच्छेदों से बाहवली स्वामी के जन्म हए थे। महापुराण में ऐसा कथन नहीं है। किसी जीवन-चरित्र पर शास्त्रों में जो परस्पर थोड़ा बहत मत का युगल-जन्म नहीं लिखा है। वैभिन्य पाया जाता है उसका सम्यक् परिज्ञान संभव है। ७. ऋषभदेव के कितने पुष थे? उन्हीं भगवान् बाहुबली को एक सातिशय विश्व पपपुराण, हरिवंशपुराण, पउमरिय, पौर श्वे० विश्व ५७ फोट उत्तुंग विशाल प्रतिमा श्रवणबेलगोला के ग्रन्थों में १०० संस्था लिखी है किन्तु महापुराण में १०१ विष्यगिरि पर्वत पर श्रीरामुण्डराय नपति ने सन् ९८२ पुष बताये हैं। में प्रतिष्ठित की थी। इस प्रतिमा की एक विशेषता बास भवेब सापकच्छ महाकच्छ का क्या रिक्तापा? तौर सेलय में लेने योग्य है कि-यह पर्वत पर एकही महापुराण पर्व १४ श्लोक ७० में ऋषभदेव की दोनों पत्थर में काटकर निर्माण की गई है। अलग पत्थर में राणियों को कच्छ महाकन्छ राजामों की बहनें बताया है। (शेष पृ० २९ पर)
SR No.538033
Book TitleAnekant 1980 Book 33 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1980
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size14 MB
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