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________________ ३६, वर्ष ३१, कि.२ अनेकान्त स्वरूप जान लिया तथा छत्तीस राग और सत्तर स्वरों नारी के प्रति जिन प्राक्रोशात्मक शब्दों का प्रयोग किया को भी । पांच शब्दों और चौंसठ कलानों को भी जान गया है उनकी पात्र वह उस सीमा तक निश्चित ही नहीं लिया। फिर गीत नृत्य और प्राकृत काव्य को भी जान रही; इतना अवश्य है कि पुरुष की भाति नारी ने भी लिया। उसने सब शास्त्र और पुराण जान लिये । अन्त मे जब तब प्रपनी विहित सीमायो का उल्लंघन किया । छह भाषाए और षड्दर्शन भी जान लिये । छियानवे विवाह संस्कार के अनुपालन के उदाहरण तो अधिकाश सम्प्रदायों को भी उसने जान लिया। उसने सामूहिक है किन्तु बहुत से उदारहण ऐसे भी है जिनमे या तो शास्त्र के लक्षणों को भी शीघ्र समझ लिया। उसने चौदह विवाह संस्कार का उपहास किया गया या उसे एक विद्यानो को पढ़-गुन लिया। पौषधियो मोर भावी घटनापो खिलवाह बना लिया गया। प्राश्चर्य तब होता है जब के समूह का भी ज्ञान उसे हो गया। छियानवे व्याधिया वह नागकुमार, श्रीपाल, करकड आदि जैसे असाधारण पुण्य उगलियों पर गिना सकती थी। बहुत से देशो की मुख्य पुरुषों ने जब, जहाँ और जैसे मन पाया तब वहा, वैसे भाषाएं उसने सीख लीं। उमने अठारह लिपियां भी जान ही कई-कई कन्यानो से विवाह रच डाले, और विडम्बना ली। नौ रसों और चार वर्गों को उसने जान लिया। यह कि जब-जैसे मन पाया तब-वसे उन्हें उन्ही के हाल जिन शासन के पनमार उमने चरित्र और निर्वद लिया। पर छोड़कर चल पडे। जिस पर मामक्ति हई वह चाहे दस्सह रति और कामार्थ में उसे कौन जीत सकता है ? विवाहिता रही हो चाहे अविवाहिता उसे प्राप्त करने के उसने म णक मुनि के पास जीवों के अट्ठानवे समासो लिए युद्ध किये, अपहरण किये, बलात्कार किये, यहाँ तक • का अध्ययन किया। समाधिगुप्त मुनि के पास उसने इन वि हत्याये भी की। इससे भी अधिक विचारणीय स्थिति समस्त शास्त्री को अच्छी तरह जान लिया। तब बन पड़ती है जब अपनी नवोढायो तक को, कभी कभी तो हजारों पत्नियो को यों ही छोड़ कर वे दीक्षा ले विवाहित जीवन का मूल्यांकन लेते । उदाहरण के रूप मे महस्रगति', नागकुमार', श्रीपाल', ब्रह्मचर्य की महिमा जैन प्राचार सहितानो में मामूल- करकड' प्रादि उल्लेखनीय है। चूत विद्यमान है । विशेष रूप से नारियो को इसके उपदेश ऐसे कार्य सम्राट से लेकर जनमाधारण तक में होते का पात्र बनाया गया। पुरुपो को ब्रह्मचर्य के जो उपदेश थे। इनमे श्रेणिक, चिलातपूत्र', हयग्रीव', सिंह नामक दिये गये उनमें भी नारी को इस व्रत के पालन में सबसे भिल्ल राजा, मधुरापुरी के एक राजा", रत्नशेखर" बड़ी बाधा के रूप में चित्रित किया गया। इस प्रसग मे नामक तथा मनोवेग१२ नामक विद्याधर, धवल सेठ १. नरसेन : पूर्वोक्त, पृ० ७-८, स० १, क०७। ८ विबुह सिरिहर : वढमाणचरिउ, नई दिल्ली १६७५, २. स्वयभू : पउमचरिउ, नई दिल्ली, १६७५, पृ० पृ०८५-६१, स०४, क० ५ । २४१, स० १५, ५०६। ___६. पुष्पदन्त : पूर्वोक्त, पृ० ६६, स०५, क. ४॥ ३. पुष्पदन्त . पूर्वोक्त, पृ० २४१, स०६, क० २४। १०. पुष्पदन्त : णायकुमार चरिउ, नई दिल्ली, १९६२, ४. नरसन पूर्वोत्त, पृ० १८५, स० २, क० ३६ । पृ०७३-७७, स० ५, क०२) ५. कन कामर : करकण्डचरिउ, नई दिल्ली, १९६४, ११. वीर कवि : जम्बूमामि चरिउ, नई दिल्ली, १९६८ पृ० १५७, स० १०, क० २३ । पृ. ६३-६४, स० ५, क० ३।। ६. पुष्पदन्त : वीरजिणिदचरिउ, नई दिल्ली १९७४. १२. पुष्पदन्त · वीरजिणिदचरिउ, नई दिल्ली, १९७४. पृ० ६५, स० ५, क. २ । पृ० ६७, स. ५, क. ३ । ७. उपर्युक्त, पृ० ७६, स०६, ०४। १३. नरसेन : पूर्वोक्त, पृ० ३६-४५, स० १, क० ३८.४४।
SR No.538031
Book TitleAnekant 1978 Book 31 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages223
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size12 MB
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