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________________ अग्रवालों की उत्पत्ति २७ का संचालन किया है और अपनी कीतिको चिरस्थायी ऐसी स्थिति में सहसा हिपा मे चूणा हो जाना माश्चर्यबनाने का प्रयत्न किया है। जनक है। कर्ता ने इसका समर्थक कोई प्रमाण नही दिया। __संभवतः ३२६ ई० पूर्व सिकन्दर की वापसी में लगता है यह भी कोरी कल्पना ही है । हिंसा पर हिंसा प्रमोहे के प्रग्र श्रेणी गणतत्र से मुठभेड हुई है। प्रयोहे के का प्रभाव किस निमित से पडा है. उसे व्यक्त किये बिना वर्तमान अग्रवालो के पूर्वज अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा उसकी यथार्थना सन्देहास्पद ही है अथवा कवि की कोरी के लिए वीरतापूर्वक लडे और उन्होने सिकन्दर के यूनानी कल्पना ही जान पडती है, अन्यथा जिस हिसा की महत्ता सैनिकों के दांत खट्टे किये, किन्तु वे पाकान्ता की विपुल ने राजा के अन्तर्मानस को प्रभावित किया, उसका कोई सैन्य शक्ति के प्रागे ठहर न सके । फलतः बीस हजार कारण अवश्य होना चाहिए, जिसे ग्रन्थ कार व्यक्त नहीं स्त्री.बच्चो ने जौहर द्वारा अपना अन्त किया। जो कर सका। जान Tea कर मका। जान पडना है कथाकार ने महालक्ष्मीबत की aur इधर-उधर भाग गये थे, व्यापारादि द्वारा अपनी प्राजीविका महत्ता बतलाने के लिए एमी कल्पना को हो । करने के कारण वैश्य अग्रवालो मे उनको गणना होने 'अग्रवाल' शब्द पर विचार लगी। ___ डा० मत्यकेतु ने अग्रवाल जाति के प्राचीन इतिहास कहा जाता कि प्रयोहा मे अग्रमेन नाम का कोई के पृष्ठ १५६ पर लिखा है कि "प्रगरवाल शम्म बहत राजा था, उसी की संतान परम्पग मे अग्रवाल कहे जाते पुगना नही है, इस जाति के लिए जो विभिन्न नाम पहले हैं। यद्यपि प्रग्रसेन नामक राजा की कोई इतिवनि नही प्रयुक्त होते थे अग्रोतान्यव उनमे एक है।" जान पडता मिलती और न इतिहास तथा पुराणो में उसका डा० साहब को अग्रवाल शब्द को प्राचीनना का उल्लेख नामोल्लेख ही उपलब्ध होता है और न उसकी वंश नही मिला, इसी से उन्होंने ऐसा लिखा है। प्राकार परम्परा का ही नामोल्लेख मिलता है। उसके अट्ठारह अपभ्रश भाषा में "अगरवाल" शब्द सन १९३२ मे तोमर पुत्रो प्रादि का भी इतिहास मे कही कोई उल्लेख नहीं वशीय राजा प्रनंगपाल तृतीय के समय प्रचलित था। मिलता है। इससे अग्रसेन नाम कल्पित जान पड़ता है। अगरवाल का अर्थ प्रणवाल होता है। कविवर पोखरा किसी ने 'ग्रन' शब्द के प्रागे 'सेन' शब्द जोडकर अग्रसेन स० ११८६ (सन् ११३२) में दिल्ली में रचित पास. नाम की कल्पना कर ली, अन्यथा सत्रह यज्ञ करने वाले णाहचरिउ' मे उक्त प्रगरवाल शब्द का उल्लेख अग्रवालो राजा का पुराणों यादि में नामोल्लेख तक न होना ही के लिए किया गया है, इतना ही नही किन्त अग्रवाल साह उमको प्रमाणिकता का द्योतक है। जेजा के ज्येष्ठ पुत्र गधव का उल्लेख करते हुए उसे 'ग्रो. प्रज्ञानकर्तृक महालक्ष्मी व्रत-कथा के अनुसार, राजा तकान्वय नमोङ्गण पार्यणेन्दु बतलाया गया है जिसका अग्रसेन को अन्तिम यज्ञ मे हिसा से महसा पूणा हो गई, अर्थ अग्रवाल वशरूपी आकाश का चन्द्रमा होता है। इससे और उसने बीच में ही यज्ञ बन्द कर दिया। राजा का प्रमाणित होना है कि अग्रवाल वंश उम समय बहत प्रसित हिमात्मक यज्ञो से महमा उदासीन हो जाना, यह घटना हो चुका था। 'अध्यय' शब्द वश परम्परा का सचक है। अपने मे किसी रहस्य विशेष को ममोये हुए है। उसका अनंगपाल तृतीय के समय साहू जैजा का कुटम्ब अत्यन्त कोई न कोई कारण अवश्य रहा जान पड़ता है, जिसका प्रसिद्ध था। इनके लघु पुत्र नट्टल माह ने दिल्ली में प्रालि ग्रन्थ में कोई खनासा नही, क्योंकि बिना कारण के कार्य नाथ का एक सुन्दर मन्दिर बनवाया था और उसकी की उत्पत्ति नहीं होती। जिसे जीवन में कभी प्रबल हिंसा प्रतिष्ठा भी की थी। वह राज्यमान्य था और उसका से खेद तक नही हुमा, प्रत्युत उसमें हर्ष मानता रहा हो, व्यापार अग, बंग, कलिंगादि देशों में होता था। उसी ने १. भारतीय इतिहास : एक दृष्टि, प्रथम सस्करण, भारतीय ज्ञानपीठ, पृ०७४ । २. यस्यागजो जनि सुधोरिह राघवास्ययो, ज्यामानमन्दमतिसज्झितसर्वदोषाः । अग्रोतकान्वयनभोगणपार्थणेन्दुः, श्रीमाननेकगुणरज्जित-चारुचेताः-पास. च. ।
SR No.538031
Book TitleAnekant 1978 Book 31 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1978
Total Pages223
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size12 MB
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