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________________ १४८, वर्ष २९, कि० ४ अनेकान्त लोक में (स्थल रीति से) मुख द्वारा अन्न-पान, उपस्थित करता है-उसके साधनभूत प्राणों का नाश खाद्य-प्रखाद्य का ग्रहण करना 'पाहार' रूढ़ि में प्रचलित करता है तो ऐसा समझना चाहिए कि वह उसके सांसा. हो गया है। परन्तु वास्तव में यदि हम पाहार को परि- रिक रूग को दूखी बनाने का प्रयत्न करता है। ऐसे भाषा करें तो ऐसा कह सकते हैं कि उन सब पदार्थो अनधिकार को प्रयत्न लोक में हिंसा नाम दिया गया है का, जो इस 'स्व'-जीव से 'पर' है, ग्रहण करना पाहार पौर विवक्षा भेद से इसके अनेकों भेद हो जाते हैं। पाहार की व्याख्या के प्रसंग में एक स्थान पर इसी संसारी जीव पाहार पर प्राधित है। यदि पाहार लक्षण को अनुसरण करने वाला उल्लेख मिलता है। वहाँ नही तो उसका संसार भी नही। यह माहार विभिन्न रूपों कहा गया है-'प्रौदारिक, वैक्रियिक, माहारक तीन शरीर का है, अतः इसके ग्रहण करने के साधन भी विभिन्न है तथा छह पर्याप्तियों के योग्य पुद्गलों के ग्रहण करने को पौर वे हैं -- इन्द्रियां (स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु पोर पाहार कहते है।' ऊपर गिनाये गये दश प्राण उक्त कर्ण), मनोबल, वचनबन, कायबल, प्रायु और श्वासोच्छ- माहार-प्रहण में कारण है । अतः उक्त दश प्राणों का हरण वास । इस प्रकार ये दश प्राण कहलाते है । क्योंकि जीव करना लोक में हिंसा कहलाता है । जैन धर्म ने इस प्रकार को संसार-धारण में कारण ये ही है । इनके द्वारा जीव की हिंसा के त्याग का उपदेश दिया है। अपने योग्य पाहार (वर्गणाओं) का ग्रहण करता है और यद्यपि साधारणतया भारतीय-सस्कृति और प्राचार जीता है। अतः जीवन के कारण-भूत पाहार ग्रहण कराने मे सर्वत्र ही हिसा को स्पर्श किया गया गया है तथापि वाले इन साधनों से किसी जीवधारी को वंचित करना इसमे अवगाहन करने वाले अनेकों ऋषि, महर्षि अहिंसा के हिसा कहलाता है, क्योंकि आहार संसारी जीव की स्थूल प्रश को भी स्पर्श नही कर पाये है। यदा-कदा तो स्वाभाविकी प्रवृत्ति है। इसके बिना वह जीवित नहीं रह उनकी दृष्टि, स्वार्थपरक होने के कारण, हिसा मे ही अहिंसा सकता। की मान्यता करने को वाध्य हो, विपरीत मार्ग का अनु___ जीव के द्वारा अनुभव किये जाने वाले ऐसे ससारी सरण कर गई है। याज्ञिकी हिमा हिंसा न भवति' जैसे सुख-दुख भी जिनका संबंध स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, शब्द, सिद्धान्तों की उपज निजी स्वार्थ --स्वर्ग-सुख की कामना चिन्तन, प्रायु और श्वास से है, एक प्रकार के आहार नहीं, तो और क्या है ? यह सत्य है कि प्राणी स्वार्थ ही हैं, क्योकि ये जीव की स्वाभाविक शुद्ध चैतन्य रूप में लीन होकर दूसरो के सुख-दुख का ध्यान नहीं रखता, परिणति से भिन्न है और जीव इनका पाहार- हरण, अथवा अपने स्वार्थों के सन्मुख होने पर वास्तविकता से इन्द्रिय, मन, श्वासोच्छवास आदि के द्वारा करता है, अपनी दष्टि हटा लेता है; अन्यथा 'अहिमा भूतानां जगति और पर को ग्रहण करना ही पाहार है। कहा भी है - ग्रिदितं ब्रह्मपरम' जैसे विशद और निर्मल तथ्य मानने से पा-समन्तात् हरणं, आहारः। अर्थात् संसार मे अनेको कौन इन्कार कर सकता है ? प्रकार की वर्गणाएं भरी हुई है। प्राकाश मे कोई एक पाहार के भेदों के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता हैप्रदेश भी ऐसा नही, जो इन वर्गणामों से शून्य हो। जब 'णोकम्म कम्महारो कवलाहारो य लेप्पमाहारो। यह जीव विभिन्न प्रकार की इन वर्गणाओं मे से प्रोज मणो वि य कमसो माहारो छविहो यो।" अपने संसारानुकल किन्ही स्व-विजातीय वर्गणामो को -नोकर्म पाहार, कर्म पाहार, कवलाहार, लेपाहार, ग्रहण करता है तब कहने में आता है कि जीव ने पाहार प्रोजाहार और मनसाहार । ग्रहण किया । ऐसे जीव के प्राहार में बाधा देने की क्रिया १. नोकर्म आहार-नो कर्म वर्गणाओं को ग्रहण करना। हिंसा है, क्योंकि पाहार की कमी मे उसका वर्तमान २. कर्माहार-कर्म वर्गणामो को ग्रहण करना। सामान्य संसारी जीवन सन्देह मे पड़ जाता है । ३. कवलाहार-मुख द्वारा पुद्गल वर्गणामों को ग्रहण यदि कोई जीव किसी अन्य जीव के आहार में बाधा करना। (क्रमशः)
SR No.538029
Book TitleAnekant 1976 Book 29 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1976
Total Pages181
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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