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________________ महावीर का धर्म-दर्शन : माज के सन्दर्भ में जैन धर्म का प्रन्तिम लक्ष्य मोक्ष या मुक्ति है। यह ऐमा स्पाट लगता है, कि जैनधर्म जीवन का विरोधी है, मृवित कैमे पायी जा मकती है ? तत्वार्थमूत्रकार प्राचार्य और उमका मोक्ष जगत से पलायन है। इस प्रतिवाद को उमास्वाति के शब्दों में, "सम्यकदर्शन-ज्ञानचारित्राणि नकाग नहीं जा सकता: मोक्षमार्ग ' । जीवन-जगत्, वस्तु-व्यक्ति को सही देखना, यह भी स्पष्ट है कि स्वय महावीर दीर्घ तपस्वी थे, सही जानना, और तदनुसार उनके साथ सही व्यवहार और उन्होने निदारुण तपस्या का जीवन बिताया था। पर करना- यही मोक्षमार्ग है, यानी विश्व के माथ व्यक्ति वे तो तीर्थकर यानी युगतीथं के प्रवर्तक और परित्राता प्रात्मा का सम्बन्ध जब अलिम रूप मे मम्यकदर्शन-ज्ञान- होकर जन्मे थे । इसी कारण चरम तपस्या के द्वारा चारित्र्यमय हो जाता है, तो अनायास ही आत्मा की मुक्ति त्रिलोक और त्रिकाल के कण-कण और जन-जन के साथ घटित हो जाती है। तादात्म्य स्थापित करना उनके लिए अनिवार्य था । वे चीजों और व्यक्तियो के माथ जब हमाग मम्बन्ध स्वय ऐगी मत्य जयी तपस्या करके, पोगे के लिए अपने वस्त लक्ष्यी और वीतरागी न होकर, प्रात्मलक्ष्यी और युगतीर्थ के प्राणियों के लिए, मुक्ति-मार्ग को सुगम बना मगगी होता है, तो वह गमात्मत्र. तीव्रता विश्व में मर्वत्र गये है और सबको अमरत्व प्राप्ति का सहज ज्ञान-मन्त्र दे व्याप्त सूक्ष्म भौतिक पुदगल-परमाणूमो को आकृष्ट करके, गये है। हमारी चेतना को उनके पाश मे बाध देती है। इमी को लेविन वस्तुत उत्तरकालीन जिन-शासन में जो कर्म-बन्धन कहते है, यानी गग और उसकी परिणति अति निवत्तिवाद का बोलबाला रहा, वह वैदिक धर्म के द्वप, इन दोनो के प्रात्मा में घटित होने पर वस्तुप्रो के प्रति प्रवृत्तिवाद और भ्रष्टाचारी कर्म-काण्डो की प्रतिसाथ प्रात्मा का स्वाभाविक मम्बन्ध भग हो जाता है, क्रिया के रूप में ही घोटत हया है। फलतः वैराग्य, तप और उनके बीच कर्मावरण की पोट पड़ी हो जाती है। और जीवन-विमुखता पर बेहद जोर दिया गया है। नतीजा जगत् के साथ जब मनुष्य का मरबन्ध विशुद्ध वस्तु-लक्ष्यी यह हा कि अल्पज्ञ साधारण जैन श्रावक और श्रमण इम यानी काजक्टिव" या वीतरागी हो जाता है, इसी को तप-मंयम क बाह्यानार को ही सब कुछ मान कर उमी जैन द्रष्टायो ने मोक्ष कहा है। में चिपट गये। इस प्रवृत्ति के कारण जैन हटामो की ____ ग्रात्मा के इस तरह मुक्त होने पर, उमके भीतर का अमली, मौलिक विश्व-दृष्टि लात हा गयी। जो मुलगत पूर्ण ज्ञान है, अर्थात् म का मर्यकाल में मपूर्ण यह दृष्टि हम भगवान् कन्दकुन्दाचार्य के दृष्टि-प्रधान जानने की जो क्षमता या शक्ति है, वह प्रकट हो जाती है। ग्रन्थ 'ममयसार' में यथार्थ रूप में उपलब्ध होती है। यह इमी को केवल ज्ञान कहते है, अर्थात् एकमेव शुद्ध, अम्बड कहना गायद अत्यक्ति न होगी कि. महावीर के बाद प्रत्यक्ष ज्ञान । केवलज्ञान होने पर लाक के साथ मनुष्य का भगवान् कन्दकन्ददेव ही जिन-शासन के मधन्य और एक अमर, अबोध, अविनाशी सम्बन्ध स्थापित हो जाता मौलिक प्रवक्ता हा है। उनकी वाणी में प्रात्मानभूति का है। इस प्रकार जैन दर्शन को गहराई से ममझने पर पता रूपान्तरकारी रसायन प्रकट हुपा है। उन्होने 'ममयसार' चलता है कि वह जगत्-जीवन से मनुष्य का तोडने या मे स्पष्ट मिखाया है कि वस्तु का अपना स्वभाव ही धर्म अलग करने वाला धर्म नहीं है बल्कि जगत् के साथ है। तुम अपने स्वभाव मे रहो, वस्तु को प्रपन स्वभाव में जीव का सच्चा और स्थायी नाता स्थापित करने की रहने दो। अपने स्वभाव को ठीक-ठीक जानो और उसी शिक्षा ही जैनधर्म देता है। मे सदा अवस्थित रहकर सम्यक्-दर्शन और सम्यक-ज्ञान पूर्वक इस जगत् जीवन का उपयोग करो, यानी मोग का महावीर के १००० वर्ष बाद जिनवाणी के ग्रन्थ-बद्ध इनकार उनके यहा कतई नही है। मगर सम्यक्दृष्टि पोर होने पर उसमे जो जैन धर्म का उपदेश मिलता है, उसमें सम्पज्ञानी होकर भोगो। तब तुम्हारा भोग बन्धन और प्रकटत: कठोर संयम, वैराग्य पोर तप की प्रधानता है। कष्ट का कारण न होगा, बल्कि मोक्षदायक और मानन्द
SR No.538029
Book TitleAnekant 1976 Book 29 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1976
Total Pages181
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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