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________________ ११०, २६, कि० ३ मनकामन मत्यनुपालन-राजानों को वृद्ध मनुष्यों की सगति- को जानने वाला निमित्तज्ञानी अपने जीवन का मन्त रूपी सम्पदा से इन्द्रियो पर विजय प्राप्त कर, धर्मशास्त्र बतला दे अथवा अपने माप ही निर्णय हो जाए तो उस और अर्थशास्त्र के ज्ञान से अपनी बुद्धि सुसंस्कृत करना समय से शरीर परित्याग को बुद्धि धारण करे; क्योंकि चाहिए (३८.२७२)। यदि राजा इससे विपरीत प्रवृत्ति त्याग ही परम धर्म है, त्याग ही परम तप है, त्याग से ही करेगा तो हित अहित का जानकार न होने से बुद्धिभ्रष्ट इहलोक में कीर्ति और परलोक में ऐश्वर्य की उपलब्धि हो जाएगा (३८.२७३) । इहलोक तथा परलोक सम्बन्धी होती है।" प्रात्मा का स्वरूप न जानने वाला जो क्षत्रिय पदार्थों के हित-अहित के ज्ञान को बुद्धि कहते है। अपनी आत्मा की रक्षा नहीं करता उसकी विष, शस्त्र अविद्या का नाश करने से उस बुद्धि का पालन होता है। प्रादि से अवश्य ही अपमृत्यु होती है अथवा शत्रुगण तथा मिथ्या ज्ञान को अविद्या कहते है और प्रतत्त्वों मे तत्त्व- क्रोधी, लोभी और अपमानित सेवकों से उसका अवश्य ही बुद्धि का होना मिथ्या ज्ञान है । बिनाश होता है और अपमृत्यु से मरा प्राणी दुःखदायी मात्मानपालन- इहलोक तथा परलोक सम्बन्धी तथा कठिनाई से पार होने योग्य इस संसाररूपी पावर्त अपायों से प्रात्मा की रक्षा करना प्रात्मा का पालन कह· में पड़कर दुर्गतियों का पात्र होता है। लाता है।" राजा की रक्षा होने पर सबकी रक्षा हो प्रजापालन - जिस प्रकार ग्वाला पालस्यरहित होकर जाती है (३८.२७५)। विष, शस्त्र प्रादि अपायो से रक्षा प्रयत्नपूर्वक गायो की रक्षा करता है, उसी प्रकार राजा करना तो बुद्धिमानों को विदित है; परलोक सम्बन्धी को भी प्रजा का रक्षण करना चाहिए।" उसके रक्षण अपायों से रक्षा धर्म के द्वारा ही हो सकती है, क्योकि कार्य को कुछ रीतियां निम्नलिखित है, जिन्हे ग्वाले के धर्म ही समस्त प्रापत्तियों का प्रतिकार है।८ धर्म ही दृष्टान्त से स्पष्ट किया गया है :अपायों से रक्षा करता है, धर्म ही मनचाहा फल देता है, १. अनुरूप दण-यदि गायो के समूह में से कोई धर्म ही परलोक में कल्याण करने वाला है और धर्म से गाय अपराध करती है तो वह ग्वाला अंगच्छेदन प्रात ही इस लोक मे प्रानन्द प्राप्त होता है। जिस राज्य के कठोर दण्ड न देकर अनुरूप दण्ड से नियन्त्रित करके लिए पूत्र तथा सगे भाई भी निरन्तर शत्रुता किया करते उसकी रक्षा ही करता है, उसी प्रकार राजा भी अपवी है, जिसमे बहुत से अपोय है, वैसा राज्य बुद्धिमान पुरुषो से प्रपोयसा राज्य बद्धिमान पुरुषो प्रजा की रक्षा करे। कठोर दण्ड देने वाला राजा अपनी को अवश्य छोड़ देना चाहिए।" मानसिक खेद की बह- प्रजा को अधिक उद्विग्न कर देता है, इसलिए प्रजा उसे लता वाले राज्य मे सुखपूर्वक नहीं रहा जा सकता, छोड़ देती है तथा मन्त्री प्रादि भी विरक्त हो जाते है।" क्योंकि निराकुलता ही सुख है। जिसका अन्त अच्छा २. मुख्य वर्ग को रक्षा-जिस प्रकार ग्वाला अपनी नही है, जिसमें निरन्तर पाप उत्पन्न होते रहते है ऐसे गायो के समूह में मुख्य पशुओं के समूह की रक्षा करता राज्य में सुख का लेश भी नही होता। सब प्रोर से शकित हुआ पुष्ट (सम्पत्तिवान्) होता है; क्योकि गायों की रहने वाले पुरुष को राज्य में भारी दुःख बना रहता है, रक्षा करके ही वह विशाल गोधन का स्वामी हो सकता प्रतः विद्वान पुरुष को अपथ्य औषधि के समान राज्य का है, उसी प्रकार राजा भी अपने मुख्य वर्ग की प्रमुख रूप परित्याग कर देना चाहिए और पथ्य भोजन के समान से रक्षा करता हुआ अपने और दूसरे के राज्य में पुष्टि तपश्चरण करना चाहिए। प्रतः राज्य के विषय मे पहले को प्राप्त होता है । " जो राजा अपने मुख्य बल से पुष्ट ही विरक्त होकर भोगोपभोग का त्याग कर दे; यदि वह होता है यह बिना किसी यत्न के समुद्रान्त पृथ्वी को जीत ऐसा करने में असमर्थ हो तो अन्त समय में उसे राज्य के लेता है।" प्राडम्बर का अवश्य त्याग कर देना चाहिए। यदि काल ३. घायल और मृत सैनिकों की रक्षा यदि प्रमाद ८५-८६. ४२.३१-३२ ८७. ४२.११३ ६२. ४२.१३४.१३५, ३८.२७६ ८८.८६. ४२.११४.११६ ६०.६१. ४२.११८, ११६-२४ ६३-६४. ४२.१३६-१४२ ६५-६६. ४२.१४४-१४५
SR No.538029
Book TitleAnekant 1976 Book 29 Ank 01 to 04
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGokulprasad Jain
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1976
Total Pages181
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size10 MB
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