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________________ किरण] अर्थका अनर्थ १२७ बक्षण उद्धृत करके उमपरसे अपने अनुकूल मन्तव्य मुख्य वाचार्थ है और प्राचार उसका निमित्त है। निकालनेकी चेष्टा की है। तथा आचार्य नेमिचन्द्र किन्तु कमकाण्डमें प्राचारको गोत्रका वाच्यार्थ मान सिद्धान्तचक्रवर्तीके उच्चगोत्रके लक्षणको धवलाके लिया गया है। प्रतिकूल अत एव परिस्थितिजन्य बतलाया है । एवं पं०जीका निष्कर्ष न०२ आपत्तिजनक है। पूज्यपादकी सर्वार्थसिद्धिके एक वाक्यका भी स्वम व आपने सन्तानका प्रसिद्ध अर्थ त्याग कर जो नया नोऽनुकूल अर्थ किया है। इस तरह अर्थका अनर्थ अथे किया है उसका ममथन धवलाके उक्त लक्षणोंसे करनेस शास्त्रज्ञ तो भ्रममं नहीं पड़ सकते किन्तु जो तो नहीं होता। प्रथम तो धवलाकारने स्वयं ही स्वयं शास्त्रज्ञ नहीं है और अन्य शास्त्रज्ञोंकी बातको सन्तान शब्द का अर्थ गोत्र, कुल और वंश किया ही प्रमाण मानकर चलते हैं, वे इससं भ्रममें पड़ है। इन सब अर्थोंको छोड़ कर एक नया अर्थ घड़ना सकते है, अतः प्रकृत लेखके उक्त मन्तव्योंपर प्रकाश कोई मान नहीं रखता। दूसरे, धवलाकारने उच्चडाला जाता है। गोत्रके लक्षण में केवल दीक्षायोग्य साधु आचरणधवलाका लक्षण इस प्रकार है वालों की परम्पराको उच्चगोत्र नहीं कहा, वल्कि "दीक्षायोग्यसाध्वाचरणानां साध्वाचारैः कृत- उसके साथमें एक विशेषण और लगाया है कि सम्बधानाम आयेप्रत्ययाभिधानव्यवहारनिबन्ध- जिन्होंने साधु आचारवालोंके साथ सम्बन्ध' (मूलमें नानां सन्तानः उच्चैोत्रम्। ...............तद्विपरीतं 'कृतसम्बन्ध' शब्द है)। यदि सन्तानका अर्थ नीचैर्गोत्रम्।” 'परम्परा' मात्र लिया जाता है तो यह विशेषण व्यर्थ 'जो दाक्षायोग्य साधु आचरणवाले हों, जिन्होंने पड़ जाता है क्योंकि जब दीक्षायोग्य आचरणवासाधु आचारवालोंके साथ सम्बन्ध स्थापित कर लोकी परम्परा ही उच्चगोत्र अभीष्ट है तो उनके लिया हो तथा जिनमे यह 'आर्य' हे इम प्रकारकी दीक्षायोग्य साधु आचारवालोंसे सम्बन्ध स्थापित ज्ञानकी प्रवृत्ति हो और यह 'आर्य' है इस प्रकारका शाब्दिक व्यवहार होने लगा हा उनकी परम्पराको करने या न करनका कोई महत्व ही नहीं रहता। उच्चगोत्र कहत है और इसके विपरोत नीचगोत्र है। किन्त धवलाकारको यह बात अभीष्ट अहीं है कि जिनका केवल व्यक्तिगत आचरण साधु हो किन्त गोत्रका सामान्यलक्षण जीवस्थान चूलिका कौटुम्बिक संबन्ध साधु आचरणवाले पुरुषोंके साथ अधिकारकी धवला टीकामे इस प्रकार किया है न हो व मात्र व्यक्तिगत आचरणके कारण उच्च 'गोत्रं कुलं वंशः सन्तानमित्येकोऽर्थः' गोत्री कहलाए। इसी लिये उन्होंने एक विशेषण गोत्र, कुल, वंश, और सन्तान ये एकार्थवाची और लगा दिया है। नाम है। ये सब. लिखकर पं० जीने उसपरसे निम्न आचाय नेमिचन्द्र के जिस लक्षणको पं0 जी निष्कर्ष निकाले है परिस्थितिजन्य बतलात हैं वह परिस्थितिजन्य नहीं १-'आर्य होकर भी जो दीक्षायोग्य साध आचा- है किन्तु स्वामी वीरसेनक उक्त लक्षणका अनुवाद रवाले है वे उच्चगोत्री और शेष नीचगोत्री है। मात्र है जो पलट कर रख दिया गया है। स्वामी २-सन्तानका अर्थ पुत्र, पौत्री, प्रपौत्रीकी परम्परा वोरसेन दीक्षाके योग्य साधु-आचरणवालोंकी न होकर आचारवालोंकी परम्परा है गोमट्रसार सन्तानको उच्चगोत्र कहते है और प्राचार्य नेमिचन्द्र कर्मकाण्डमें सन्तानक्रमस आये हुए जीवके आचा- सन्तानक्रमसे आये हुए जीवके आचारको गोत्र रको गोत्र कहा है। धवला टीकाके उक्त लक्षणको कहते है। अभिप्राय दोनोंका एक है, नेमिचन्द्राचादेखनेसे मालूम पड़ता है कि यह लक्षण उलटकर बने निमित्त साधु आचरणपर विशेष जोर दे दिया लिखा गया है। सन्तान (परम्परा) यह गोत्रका है। केवल इतना ही अन्तर है। जैसे-धनिककी
SR No.538010
Book TitleAnekant 1949 Book 10 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1949
Total Pages508
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size30 MB
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