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________________ किरण ३-४ ] कलकत्तामें वीरशासनका सफल महोत्सव प्रधान सभापति महोत्सवने प्रक्षा की। इस अवसर पर भाषण पढ़ा, जो अनेक रष्टियोंसे महत्वपूर्ण था और जिसमें विमित्र प्रान्तों, विभिन्न समाजों और विमिस धर्म सम्प्रदायों वीरशासनकी विशेषताओं तथा तसंबंधी महत्वका दिग्दर्शन के" कालिज छात्राोंने श्रीसुशीलादेवीके नेतृत्वमें कराते हुए उसके प्रति संक्षेपमें अपने कर्तव्यपालनका असा ऊँचा झंडा जिनशासनका' यह सुन्दर गान बड़ी ही मधुर निर्देश किया गया है। इसके बाद ता.कालीदास नाग . ध्वनिसे गाया, और वह सबको बड़ा ही प्रिय मालूम दिया। एम.ए. का म. महावीरकी सेवामों और उनके अहिं. तत्पश्चात् सभामण्डपमें अधिवेशनकी कार्रवाई प्रारंभ सादि शासनकी महत्ताके सम्बन्ध में एक बड़ा ही महत्वपूर्ण हुई। मगलाचरण और उक्त छात्राओंका 'अखिल जग सारण भाकर्षक भाषण हुमा, जो खूब पसन्द किया गया। को जलयान. प्रक्टो वीर ! तुम्हारी वाणी जगमें सुधा- ता. २ नवम्बर को सुबह जैन भवनमें जैनधर्म परिषद समान' यह मंगलगान हो जानेके अनन्तर सभापतिका का जत्सा बाबू अजितप्रसादजी एम० ए० लखनऊ के सभा. चुनाव हुआ। इसके बाद डा. श्यामप्रसाद मुकरजी एम. पतिस्वमें हुमा, जिसमें पं. कैलाशचन्द्रजी शाबीने 'भ. ए० डी० लिट०, प्रेसीडेंट प्रान डिया हिन्दु महासभा, महावीरका अचेलक धर्म' नामक निबन्ध पदना शुरु किया, का महोत्सव उद्योधन रूपमें महत्वका अंग्रेजी भाषण जो विषयकी दृष्टिसे ऐतिहासिक एवं महत्वपूर्ण था, परन्तु हुमा, स्वागताध्यक्ष साहू शान्तिप्रसादजीने अपना भाषण स्वागताध्यक्ष ने उसे कुछ अप्रासंगिक तथा उस ऐक्य में पढ़ा, एक महिलाने बाजे पर बगलामें 'महावीर सदेश' बाधक समझ कर ऐका जो दिगम्बर और श्वेताम्बर समाजों गाया और फिर बाबु निर्मलकुमारजीने माहिल्यादिके रूपमें में इस महोत्सव सम्बन्ध में वहाँ सम्पन हुभा था। इससे वीरशासनके प्रचार तथा शोध खोज कार्योके लिये कलकत्ता विद्वानों में असन्तोषकी कुछ सहर तथा गरबडी सी पैदा में एक संस्थाकी योजनाका शुभ समाचार सुनाया और हुई। फिर जैनेन्द्र जीका भाषण हुमा। मभापतिजीके सम्बे बतलाया कि उसके लिये दो लाखमे कुछ उपरका चन्दा भाषणको पूरा पढ़े जानेका अवसर ही न मिल सका। हो गया है, जो सुनाते ही तीन लाख करीब होगया और रात्रिको बेलगखियाके सभामण्डपमें 1. सातकोसी बादको दो तीन दिनों में चार लाख तक पहुंच गया। इस मुकर्जीके सभापतित्वमें जैनदर्शन परिषद्का अधिवेशन हुमा चन्वेमे सबसे बड़ी रकम ७१ हजारकी सेठ बल्देवदासकी जिसमें न्यायाचार्य प. महेन्द्रकुमारजी और प्रो. हीरामान और ४-० हजारकी तीन रकमें क्रमशः बाबू छोटेलाल जी एम.ए. के महत्वपूर्ण व्याख्यानों के अनन्तर सभापति जी, साहू शान्तिप्रमादजी और सेठ दयारामजी पोतदारकी जीका जैनधर्म अहिमादि सिद्धान्तों पर अंग्रेजी में भोजस्वी है। पोतदार महोदय प्रजैन बन्धु हैं और बा. छोटेलालजी भाषण हुश्रा । भाषणकी गति इतनी तेज थी कि वह स्थेमादि प्रतिष्ठित जैन बन्धुभोम्मे बड़ा प्रेम रखते हैं। उन्होंने शन टेनकी गतिको भी मात करती थी और इसीसे रिपोर्टमें जब यह सुना कि बाबू छोटेलालजी ५१०००)की रकमके को यथेष्ट रिपोर्ट लेते नहीं बनता था, वे कलम थाम कर साथ साथ अपना जीवन भी इस शुभ कामके लिये भर्पण बैठ गये थे। तत्पश्चात साकालीदास नागका बंगला भाषामें कर रहे हैं तो उनमे नहीं रहा गया और उन्होंने भी बड़ी जैनधर्मकी प्राचीनता, महत्ता तथा शिल्पकलादि-विषयक प्रसानाके साथ अपनी भोरमे ११...)रु. की रकम बहा ही रोचक व्याख्यान हुमा और बादको उसके माथमें श्रद्धाम्नलिके रूपमें अर्पण की, जो अनेक दृष्टियांसे बड़ी छाया चिोंकी योजनाने उमे और भी अधिक मनोरंजक मूल्यवान है । पेठ गजराजजीकी भोरम ३ हजारकी रकम बना दिया। मारी जनता एकान थी और चित्रोंको देखकर को घोषणा हुई। इस शुभ समाचारसे सारीसमा मानंद तथा भाषणको सुनकर गद्गद् हो रही थी। बाब लक्ष्मीबागया और उत्साहकी लहर दौड़ गई। तदनन्तर भारत के चन्दजी साथ साथ बंगाका हिन्दी अनुवाद भी सुनाते सभी भागोंसे माए हुए देशके प्रतिष्ठित जैनेतर विद्वानोंके जाते थे। जैनधर्म प्रचारका यह तरीका अच्छा प्रभावशाली सन्देशोंको बालचमीचन्दजी जैन एम. ए. ने संक्षेपमें जान पड़ा। इसके बाद वैद्यराज 4. कमीयामावजी सुनाया और फिर सभापति महोदय सर सेठजीने अपना कानपुरके सभापतित्वमें जैन मायुर्वेद परिषद् हुई। समा
SR No.538007
Book TitleAnekant 1945 Book 07 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1945
Total Pages528
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size15 MB
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