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________________ फिरण] कला-प्रदर्शनीकी उपयोगिता ३१२ एठसेक पोरवात्य जिनकी स्थानिके जैन बहुत कम मिलेंगे। जैसलमेर एवं पाटणके भण्डारों इसलिए ऐमी प्रदशिनीयें जिनमें शिविध संग्रहालयों के में कई ताडपत्रीय प्रतियों में सुन्दर चित्र पाये जाते विभिन्न कला उपादानोंका एकत्रीकरण होता है बहुत हैं। जिनका रंग इतना ताजा है कि आजके से बने ही आवश्यक एवं उपयोगी सिद्ध होती है। भारत हुए प्रतीत होते हैं। जैसलमेरके पंचायती भंडारक मरकारने इनकी उपयोगिता अनुभव करके ही स्थान दो काष्ट फलक पर आलेखित चित्रोंकी चमकको देख स्थानपर संग्रहालय (म्यूजियमा स्थापित किये हैं जिन कर हम दंग रह गये। इसी प्रकार इसके पीछेके के महत्वके सम्बन्ध में कभी दो मत नहीं हो सकते। चित्रितग्रंथ, जिनमें कई बेलबूटे कई सुन्दर चित्रोंमें लंदन, कलकत्ता आदिके म्यूजियम दर्शकों के लिए ही अपनी सानी नहीं रखते, जैन ज्ञान भंडागेंमें सुरक्षित नहीं किन्तु पुरातत्त्व-अन्वेषण की दृष्टिसे भी अजोड़ हैं। अहमदाबादकी एक सचित्र कल्पसूत्रकी प्रतिका माने जाते हैं। सिक्कों एवं शिलालेखोंका संग्रह इतिहास मूल्य लाख रुपयेसे भी अधिक माँका गया है। के प्रसिद्ध उपादान हैं। चित्रकला, मूर्तिकलाके इतिहास शिल्प एवं मूर्ति निर्माण कलामें तो जैनोंने अरबों निर्माण में भी इन संग्रहालयोंका अत्यन्त महत्व है। स्वरबों रुपये व्यय किए हैं। जिनके प्रमाण स्वरूप इन प्रदर्शनीयोंने अनेक कलाकारोंको उत्पन्न किया, श्रारासगण, राणकपुर, देवगढ़ इत्यादिके जैन मन्दिर प्रोत्साहन दिया एवं अनेकों सहदय व्यक्तियों के आजभी विद्यमान है। जिनकी सूक्ष्म कलाकी प्रशंसा हृदयमें कलाका प्रेम एवं महत्व स्थापित किया है। शतशः पौरवात्य एवं पाश्चात्य विद्वानोंने मुक्तक- इस प्रदर्शनी में हमारे संग्रहकी बहुतसी वस्तुएँ आपके अवलोकनमें आएंगी, उनके संबहकी अभिरुचि भी कलाप्रदर्शनीकी उपयोगिता मरे हृदयमें ऐसे ही एक कला भवन को देखकर हुई मेरे खयालसे कलाप्रदर्दनीका प्रमुख प्रयोजन है थी उसकलाभवनके संग्रहकारकलाविद् अनन्य संग्राहक कलाकी ओर जनसाधारणका ध्यान आकृष्ट कर अभि स्वर्गीय वाय पूरणचन्दजी नाहर थे। इस कलाभवनकी वस्तुओंका उन्होंने स्वयं हमारे साथ चलकर कई बार रुचि उत्पन्न करना और कलाकारोंको प्रोत्माहन देना। सूक्षम परिचय दिया था तभी से हमारे हृदय मानममें अतएव कलाप्रदर्शनी एक महत्वपूर्ण और उपयोगी कार्य है । सौन्दर्य प्रधान एवं कलापूर्ण अनेक आकर्षक तदत कलापूर्ण वस्तुओं के संग्रहका भाव हिलोरें मारने लगा और उसीका यह थोड़ासा मूर्तरूप भाप लोगों के वस्तुएँ यत्र तत्र बिखरी पड़ी हैं उनका दर्शन एवं महत्व मन्मुख है। इसी प्रकार जैन कलाप्रेमी श्रीयुत् साराभाई को जानने में जनसाधारण समर्थ नहीं होता अतः वे नबाबको अपने चित्रकलपद्रम' ग्रंथके प्रकाशनकी चीजें संग्राहक या मालिकके स्वान्तःसुखायके रूपमें प्रेरणा अहमदाबादके देशविरति धर्माराधक समाज ही पड़ी रहती हैं। जनताकी रुचि तो उन विविध की प्रदर्शिनीके संयोजक बननेसे मिली थी।बीकानेरमें स्थानों में पड़ी हुई चीजोंको एक जगह उचित सजावट के कलापूर्ण वस्तुभोंकी बहुतायत है समयाभावसे प्रस्तुत साथ रखी जाने परहीमाकृष्ट हो सकती है। व्यक्तिगत प्रदर्शनी में उनका संग्रह बहुत ही कम हुया है इसलिए संग्रह किनके पास क्या है? हरेक व्यक्ति को मालुम फिर कभी इसका विशाल प्रायोजन करनेका मेरा भी नहीं होता एवं उनका दर्शन भी दुर्लभ होता है नम्र अनुरोध है। गुफाओंके भित्तिचित्रीको ऐसे छोटे विविध रंगोंसे सुसजित इतने पुराने चित्र हमारे देश में और कोई नहीं मिलते। इस लिये चित्रकत्सकके इतिहास और अध्ययनकी दृष्टिसे ताइपत्रके ये सचित्र पुस्तक बड़े मूल्यवान और आकर्षक वस्तु है। (मुनि जिनविजय जैन पुस्तक प्रशस्ति प्रस्ता०)
SR No.538006
Book TitleAnekant 1944 Book 06 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1944
Total Pages436
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size28 MB
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