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________________ २, किरण १२] भगवान् महावीर का जीवन चरित्र __ महापुरुषकी प्रत्येक लीलामें असाधारणता होती है। बारका फिल्म कौनसी कम्पनीने दिखाया था, जो उसने भगवान् महावीरका विवाह, उनकादाम्पत्य प्रेम, उनका करुण-रसका सर्वोत्तम खंड लिख गला ? यह सब राज्य और परिवार-त्याग और १२ वर्ष उपसर्ग सहन तुलसीदासकी एक सिद्धान्तके आधार पर उपज थी । और अखण्ड तप, भगवान् रामके स्वयंवर, वनगमन यह एक सत्य गर्मित कल्पना है। यही जीवनचरित्र-कला और १४ वर्षों तक कष्टसहनसे कौन कम मार्मिक कहा है, जिसका भगवान् महावीरके प्रत्येक जीवनचरित्रमें जा सकता है। परन्तु इस महावीर-जीवनचरित्र में कहां मैंने प्रभाव पाया है। वरना भगवान् महावीरके जीवनहै वह मार्मिकता, हृदयको उमड़ानेवाले वे दृश्य कहाँ ? चरित्रमें शास्त्रसे जरा तिरछे और सिद्धान्तकी और मुँह यदि कहा जाय कि महावीर स्वामीके जीवनचरित्रके करके खड़े होकर देखनेसे भगवान् महावीरकी जीवनलिये शास्त्रोंमें इससे अधिक वर्णन ही कहाँ तो लीलामें भरत-मिलाप जैसे एक नहीं अनेक करुणा इसका मैं उत्तर यह देता हूँ कि शास्त्रों में इसके लिये और वीर-रससे लबालब दृश्य दीख सकते हैं । किसी आवश्यकतासे अधिक मसाला है। कमी केवल लेखक- जीवन चरित्रको सफल बनाने के लिये शास्त्रीय आधारके के हृदयकी भावुकता और स्वतंत्र विचारकी है। तुलसी- साथ २ 'जीवनचरित्र-कला' को भी साथ साथ लेकर दास, बालमीकिके रामचरित्रसे, जो उन्हींके समयका चलना होगा, वरना वह न तो शास्त्र ही होगा और न लिखा माना जाता है, सैंकड़ों जगह लीक काटकर जीवनी ही। चले हैं, तो क्या इससे तुलसीके मानसमें बहा लग- लगभग २५-३० पत्रोंमें मुख्यजीवन-लीला समाप्त गया ? उल्टा चार चाँद लग गये । वाल्मीकीका लिखा कर महाराजजी उनके तत्त्वज्ञानपर आ विराजे है, जिसने 'मानस' रामजीके समयका ही लिखा माना जाता है, लगभग पुस्तकके तिहाई भागको घेरा है। सच तो यह इसलिये वह अधिक प्रमाणित भी कहा जा सकता है; है कि पर्वजन्म-चर्चा और तत्त्वज्ञान ही इस जीवनचरित्र लेकिन उसे तुलसीके मानसके मुकाबलेमें कोई दो कौड़ी में सब कुछ है । मैं पूछता हूँ कि तत्वशानसे तो सारा को भी नहीं पछता-तुलसीका मानस सर्वत्र पजता है। जैनधर्म-अागम साहित्य भरा पड़ा है, जीवनचरित्र लिखइसका कारण लेखककी भावुकता और जीवनचरित्र कर आवश्यकतातो इस बातकी थी कि आचरणकी जिस कला के साथ नायकके जीवनकी कुछ मुख्य घटनाका सभ्यताको असम्भव कहा जाता है उसको इस जीवन मेल है । तुलसीको कब और किस दैवी शक्तिने वनगमन सांचे में दालकर दिखाते कि 'यों है इस सभ्यवामें स्वासमयके राम- कौशल्या, राम सीता, राम लक्षमण और भाविकता और इस प्रकार है इस धर्ममें सत्यता। तभी राम-निषाद व लंकाके रावण-सीता संवाद सुनाये थे, यह जीवनचरित्र कहा जा सकता था। जिस धर्म फिलाफिर भी उस भावुक और कलाविश लेखककी लेखनीसे स्फीको पढ़कर संसारके बड़े बड़े फिलास्फर चकित होनिकाल अक्षर २ सत्य और प्रमाणित माना जाता है। गये । संसार प्रसिद्ध जर्मनीके बड़े धुरन्धर विद्वान जिस भगवान् महावीर भी तो नावसे दरिया पार उतरे थे प्रवर्तकके तत्त्वशानको "संसारमें जहां और धोके परन्तु कहाँ है वह भावुकता, हृदयको पिघलानेवाला वह सत्वज्ञानकी खोन समान होती है वहाँसे जैनधर्मके दृश्य कहाँ तुलसीको पंचवटीवाला भरत-मिलापके दर- तत्त्वज्ञाकी खोज शुरू होती है" ऐसा कहते हैं उस तत्त्व
SR No.538002
Book TitleAnekant 1938 Book 02 Ank 01 to 12
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherVeer Seva Mandir Trust
Publication Year1938
Total Pages759
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size105 MB
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