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________________ किरण-१०] कविवर भूधरदास और उनकी विचार-धारा [३०७ भी वही दशा हो जाती है, और अन्त में वह इंधनका काम पुरुषार्थकी कुछ कमी है। यह सब विकल्पपुंज कविको देता है। ठीक इसी प्रकार जब यह शरीर रूपी चर्खा पुराना स्थिर नहीं होने देते थे। पर मंदिरजीमें प्रवेश करते ही ज्यों पड़ जाता है, दोनों पग अशक्त हो जाते हैं। हाथ, मुह, ही अन्दर पार्श्वप्रभुकी मर्विका दर्शन किया त्यों ही दृष्टिमें नाक, कान, आंख और हृदय आदि, शरीरके सभी अवयव कुछ अद्भुत प्रसादकी रेखा प्रस्फुटित हुई । कविवरकी दृष्टि जर्जरित, निस्तेज और चलाचल हो जाते हैं तब शब्दकी गति मूर्तिके उस प्रशांत रूप पर जमी हुई थी मानों उन्हें साक्षात् भी ठीक ढंगसे नहीं हो सकती। उसमें अशक्ति और लड़- पार्श्वप्रभुका दर्शन हो रहा था, परन्तु शरीरकी सारी चेष्टाएँ खड़ानापन आ जाता है। कुछ कहना चाहता है और कुछ क्रिया शून्य निश्चेष्ठ थीं। कविवर आत्म-विभोर थे-मानों वे कहा जाता है। चर्खेकी तो मरम्मत हो जाती है। परन्तु इस समाधिमें तल्लीन हों, उनके मित्र उन्हें पुकार रहे थे, पं] शरीर रूप चर्खेकी मरम्मत वैद्योंसे भी नहीं हो सकती। जी भाइये समय हो रहा है कुछ अध्यात्मकी चर्चा द्वारा उसकी मरम्मत करते हुए वैद्य हार जाते हैं ऐसी स्थितिमें आत्मबोध करानेका उपक्रम कीजिये पर दूसरोंको कविवरकी आयुकी स्थिति पर कोई भरोसा नहीं रहता, वह अस्थिर हो उस दशाका कोई प्राभास नहीं था, हाँ, दूसरे लोगोंको तो जाती है। किन्तु जब शरीर नया रहता है, उसमें बल, तेज इतना ही ज्ञात होता था कि आज कविवरका चेहरा प्रसन्न है। और कार्य करनेकी शक्ति विद्यमान रहती है। तब वह दूसरों वे भक्तिके प्रवाहमें निमग्न है। इतने में कविवरके पढ़नेकी को अपनी ओर आकर्षित करता ही है। किन्तु शरीर और आवाज सुनाई दी, वे कह रहे हैं :उसके वर्णादिक गुणोंके पलटने पर उसकी वही दशा हो भवि देखि छवि भगवानकी। जाती है। और अन्तमें वह अग्निमें जला दिया जाता है। सुन्दर सहज सोम आनंदमय, दाता परम कल्याणकी। ऐसी स्थितिमें हे भूधर ! तुम्हीं सोचो, तुम्हारा क्या कर्तव्य नासादृष्टि मुदित मुख वारिज, सीमा सब उपमानको । है। तुम्हारी किसमें भलाई है । यही भाव कविके निम्नपदमें गुंफित हुए हैं अंग अडोल अचल आसन दिद, वही दशा निज ध्यानकी। इस जोगासन जोगरीतिसौं, सिद्धभई शिव-थानकी । चरखा चलता नाही, चरखा हुआ पुराना ॥ ऐसैं प्रगद दिखावै मारग, मुद्रा - धात - परवानकी । पग खूटे दो हाल न लागे, उरमदरा खखराना। जिस देखें देखन अभिलाषा, रहत नरंचक आनकी । छीदी हुई पांखुड़ी पांसू , फिर नहीं मनमाना ॥१॥ तृषत होत 'भूधर' जो अब ये, अंजुलि अमृतपानकी । रसनातकलीने बलखाया, सो अब कैसे खूटे। हे भाई ! तुम भगवानकी छवीको देखो, वह सहज शब्द सूत सूधा नहिं निकसै, घड़ी-घड़ी पल टूटै ॥२॥ सुन्दर हैं, सौम्य है, आनन्दमय है, परम कल्याणका दाता है, आयु मालका नहीं भरोसा, अङ्ग चलाचल सारे। रोज इलाज मरम्मत चाहें, वैद बाढ़ ही हारे ॥३॥ नासादृष्ठि है, मुख कमल मुदित है, सभी अंग अडोल और आसन सुहढ है, यही दशा आत्म-ध्यानकी है । इसी योगानया चरखला रंगाचंगा, सबका चित्त चुरावै। पलटा वरन गये गुन अगले. अब देखै नहिं आवै ।।४ सन और योग्यानुष्ठानसे उन्होंने वसुविध-समिधि जला कर मोटा महीं कात कर भाई, कर अपना सुरमेरा। शिव स्थानकी प्राप्ति की है इस तरह धातु-पाषाएकी यह मूर्ति आत्म-मार्गका दर्शन कराती है। जिसके दर्शनसे फिर अन्यके अंत आगमें ईधन होगा, भूधर समझ सबेरा ॥५॥ देखनेकी अभिलाषा भी नहीं रहती । अतः हे मधुर ! तू तृप्त कविवर इस पदको पढ़ ही रहे थे कि सहसा प्रातः काल उठकर कविवर जब सामायिक करने बैठे तब उस बुड्ढे- होकर उस छविका अमृत पान कर, वह तुझे बड़े भारी भाग्यकी दशाका विकल्प पुनः उठा, जिसे कविने जैसे तैसे दबाया से मिली है। जिसका विमल दर्शन दुःखोंका नाशक है और और नित्यकर्मसे निमिटकर मंदिरजीमें पहुंचे । मंदिरजीमें पूजनसे पातकोंका समूह गिर जाता है । उसके बिना इस । जानेसे पहले कविवरके मनमें बारबार यह भावना उद्गत हो खारी संसार समुद्रसे अन्य कोई पार करने वाला नहीं है।। रही थी कि आत्मदर्शन कितनी सूक्ष्म वस्तु है क्या मैं उसका अतः तू उन्हींका ध्यान धर, एक पर भी उन्हें मत छोड़ । तू पात्र नहीं हो सकता ? जिन दर्शन करते करते युग बीत गये देखत दुख भाजि जाति दशों दिश पूजत पातक पुज गिरे। परन्तु प्रात्मदर्शनसे रिक्त रहे, यह तेरा अभाग्य है या तेरे इस संसार क्षार सागरसौं और न कोई पार करै । Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527324
Book TitleAnekant 1954 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1954
Total Pages30
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size11 MB
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