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________________ ३०६ ] अनेकान्त सीको रंग की यह भी विदा हो जाती थी उडती किन्तु संसारके दुःखोंसे छूटने की जो टीस हृदयमें घर किये हुए थी वह दूर न होती थी, और न उसकी पूर्तिका कोई ठोस प्रयत्न ही हो पाता था । अध्यात्मगोष्ठी में जाना और चर्चा करनेका विषय उसी क्रमसे बराबर चल रहा था, उनके मित्रोंकी तो एकमात्र अभिलाषा थी 'पद्यबद्धसाहित्यका निर्माण' । अतः जब वे 'अवसर पाते कविवरको उसकी में रणा अवश्य किया करते थे। एक दिन वे अपने मित्रोंके साथ बैठे हुए थे कि वहांसे एक वृद्ध पुरुष गुजरा, जिसका शरीर थक चुका था, दृष्टि अत्यन्त कमजोर थी, दुबला-पतला लठियाके सहारे चल रहा था, उसका सारा बदन कांप रहा था, मुंहसे कभी-कभी लार भी टपक पड़ती थी। बुद्धि शठियासी गई थी। शरीर अशक्र हो रहा था किंतु फिर भी वह किसी श्राशासे चलनेका प्रयत्न कर रहा था। यद्यपि लडिया भी स्थिरवासे पकड़ नहीं पा रहा था यह वहांसे दस पांच कदम ही आगेको चल पाया था कि देव योगसे उसकी लाठी छूट गई और वह बेचारा चामसे नीचे गिर गया, गिरने के साथही उसे लोगोंने उठाया, खड़ा किया, वह हांप रहा था, चोट लगनेसे कराहने लगा, लोगोंने उसे जैसे-तैसे लाठी पकड़ाई और किसी तरह उसे ले जाकर उसके घर तक पहुँचाया। उस समय मित्रोंमें बूढ़ेकी दशाका और उसकी उस घटनाका जिक्र चल रहा था । मित्रोंमेंसे एकने कहा भाई क्या देखते हो ? यही दशा हम सबकी श्राने वाली है, उसकी व्यथाको वही जानता है, दूसरा तो उसकी व्यथाका कुछ अनुभव भी नहीं कर सकता, हमें भी सचेत होनेकी आवश्यकता है, कविवर भी उन सबकी बातें सुन रहे थे, उनसे न रहा गया और वे बोल उठे आवारे बुढ़ापा मानी सुधि बुधि बिसरानी ॥ श्रवनकी शक्ति घटी, चाल चलै अटपटी, देह लटी भूख घटी, लोचन भरत पानी || १|| दाँतनकी पंक्ति टूटी हाइनकी संधि छूटी, कायाकी नगरि लूटी, जात - नहि पहिचानी ||२|| बालोंने वरन फेरा, रोगने शरीर घेरा, पुत्रहू न आवै नेरा, औरोंकी कहा कहानी ||३|| भूधर समुझि अब, स्वहित करेगो कब यह गति है है जब तब पछते प्रानी ॥४॥ पदके अन्तिम चरणको कविने कई बार पढ़ा और यह कहा कि यही दशा तो हमारी होने वाली है, जिस पर हम कुछ दिलगीर और कभी कुछ हंस से रहे हैं। यदि हम ब नहीं सँभले, न चेते, और न अपने हितकी ओर दृष्टि [ किरण १० दी, 'तो मैं कप स्वहित करूँगा' ? फिर मुझे जीवनमें केवल पछतावा ही रह जायगा। पर एक बात सोचने की है और वह यह कि यह यज्ञ मानव कितना अभिमानी है, रूप सम्पदाका लोभी, विषय-सुखमें मग्न रहने वाला नरकीट है, बड़े की दशाको देखकर तरह-तरहके विकल्प करता है, परके बुढ़ापे और उसके सुख-दुखकी चर्चा तो करता है किन्तु अपनी ओर झांककर भी नहीं देखता और न उसकी दुर्बल दुःखावस्थायें, अनन्त विकल्पोंकि मध्य पड़ी हुई भयावह अव स्थाका अवलोकन ही करता है, और न आशा तृष्णाको जीतने अथवा कम करनेका प्रयत्न ही करता है । हां, चाहदाहकी भीषण ज्वालामें जलाता हुआ भी अपनेको ज्ञान है, पर सुखी मान रहा है। वही इसका इस अज्ञानसे छुटकारा क्यों नहीं होता उसमें बार चार प्रवृत्ति क्यों होती है वह कुछ समझ नहीं आता, यह शरीर जिसे मैं अपना मान कर सब तरहसे पुष्ट कर रहा है एक दिन मिट्टीमें मिल जायेगा। यह तो जड़ है और मैं स्वयं ज्ञायक भावरूप चेतन द्रव्य हूँ, इसका और मेरा क्या नाता, मेरी और इस शरीरकीकी जाति भी एक नहीं है फिर भी चिरकालसे यह मेरा साथी बन रहा है और मैं इसका दास बन कर बराबर सेवा करता रहता हूँ और इससे सब काम भी लेता हूँ। यह सब मैं स्वयं पढ़ता हूँ और दूसरोंसे कहता भी हूँ फिर भी मैंने इन दोनोंकी कभी जुदाई पर कोई ध्यान नहीं दिया और उसे बराबर अपना मानता रहा, इसी कारण स्वाहित करने की बात दूर पड़ती रही, इन विचारोंके साथ कविवर निद्राकी गोदमें निमग्न हो गये । Jain Education International प्रातःकाल उठकर कविवर जब सामायिक करने बैठे, तब पुनः शरीरकी जरा अवस्थाका ध्यान श्राया । और कविवर सोचने लगे जब पर्ला पुराना पड़ जाता है, उसके दोनों खुरे हिलने चलने लग जाते हैं, उरं-मदरा खखराने लगता है-आवाज करने लगता है। पंखुड़िया छिद्दी हो जाती हैं, तकली बल खाजाती है— वह नीचेकी श्रोर नव जाती है, तब सूतकी गति श्रीधी नहीं हो सकती, वह वारवार टूटने लगता है। आयुमाल भी तब काम नहीं देती, जब सभी अंग चलाचल हो जाते हैं तब वह रोजीना मरम्मत चाहता है अन्यथा वह अपने कार्यमें अक्षम होजाता है । किन्तु नया चरखला सबका मन मोह लेता है, वह अपनी अबाधगतिले दूसरोंको अपनी ओर आकर्षित करता है, किन्तु पुरातन हो जाने पर उसकी For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527324
Book TitleAnekant 1954 03
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1954
Total Pages30
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size11 MB
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