SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 39
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ फिरण १] आप्तकी श्रद्धाका फल ३७ के कारण अन्धा होकर निरन्तर ऐसे काम करता है "इति स्तुति देव ! विधाय दैन्यावरं न याचे स्वमुपेत्तकोऽसि । जिससे उसका दुख ही बढ़ता है । यह जीव अपने छाया तरु संश्रयतः स्वतः स्यास्करछायया याचितयात्मलाभः॥" हाथों अपने कंधेपर कुल्हाड़ी मार रहा है। यह हे देव ! आपका स्वतवन कर बदलेमें मैं कुछ जितने भी काम करता है प्रतिकूल ही करता है। चाहता नहीं हूँ और चाहूँ भी तो आप दे क्या संसारकी जो दशा है, यदि चतुर्थकाल होता तो उसे सकते हैं ? क्योंकि आप उपेक्षक हैं आपके मनमें . देखकर हजागें आदमी दीक्षा ले लेते । पर यहाँ कुछ यह विकल्प ही नहीं कि यह मेरा भक्त है इसलिये परवाह नहीं है । चिकना घड़ा है जिसपर पानीकी इसे कुछ देना चाहिये । फिर भी यदि मेरा भाग्य बूद ठहरती ही नहीं। भैया! मोहको छोड़ो, रागादि- होगा तो मरी प्रार्थना और आपकी इच्छाके बिना भावोंको छोड़ो, यही तुम्हारे शत्र हैं, इनसे बचो। ही मुझे प्राप्त हो जायगा। छायादार वृक्षके नीचे वस्तुतत्त्वकी यथार्थताको समझो। श्रद्धाको दृढ पहुँचनेपर छाया स्वयं प्राप्त होजाती है। आपके राखो । धनंजय सेठके लड़केको सांपने काट लिया, आश्रयमें जो आयेगा उसका कल्याण अवश्य होगा। वेसुध होगया । लोगोंने कहा वैद्य आदिको बुलाओ, आपके आश्रयसे अभिप्राय शुद्ध होता है और अभिउन्होंने कहा वैद्योंसे क्या होगा ? दवाओंसे क्या प्रायकी शुद्धतासे पापास्रव रुककर शुभास्रव होने होगा ? मंत्र-तंत्रोंसे क्या होगा? एक जिनेन्द्रका लगता है। वह शुभास्रव ही कल्याणका कारण है। शरण ही ग्रहण करना चाहिये। मंदिरमें लड़केको लेजाकर सेठ स्तुति करता है : देखो ! छाया किसकी है ? आप कहोगे वृक्षकी, पर वृक्ष तो अपने ठिकानेपर है। वृक्षके निमित्तसे "विषापहारं मणिमौषधानि मन्त्रं समुद्दिश्य रसायनं च। मर्यको किरणें रुक गई, अतः पृथिवीमें वैसा परिणभ्राम्यन्त्यहो न त्वमिति स्मरन्ति पर्यायनामानि तवैव तानि ॥" मन होगया, इसी प्रकार कारणकूट मिलनेपर - इस श्लोकके पढ़ते ही लड़का अच्छा होगया। आत्मामें रागादिभावरूप परिणमन होजाता है। लोग यह न समझने लगें कि धनंजयने किसी वस्तु- जिसप्रकार छायारूप होना आत्माका निजस्वभाव की आकांक्षासे स्तोत्र बनाया था, इसलिये वह स्तोत्र- नहीं है। यही श्रद्धान होना तो शुद्धात्मश्रद्धान के अन्तमें कहते हैं : है-सम्यग्दर्शन है। (सागर-चतुर्मासमें दिया गया वर्णीजीका एक प्रवचन) Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527268
Book TitleAnekant 1949 07
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1949
Total Pages44
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size12 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy