SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 22
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ३४६ ] कङ्काली टीलेसे प्राप्त वेदिकास्तम्भ आदिकी निर्माणकला बौद्धस्तूपोंके वेदिका स्तम्भों आदिकी कला ही जोड़की है। प्राचीनता में भी जैनकला बौद्धकलांसे पिछड़ी नहीं है यह कङ्काली टीलासे प्राप्त लेखों में जैनस्तूपके उल्लेख से प्रमाणित हो जाता है । कुषाणोंके राज्यकालमें ही मथुराकी कलाका प्रभाव चारों कोनोंमें फैल गया था । सारनाथ, कौशाम्बी, सांची आदि स्थानोंसे मूर्तियोंकी मांग आती कान्त और मथुरा उसकी पूर्ति करता था । अन्य स्थानों के तक्षक और मूर्तिनिर्माता इन्हीं मूर्तियोंके आधारपर स्थानीय शैलीकी मूर्तियोंका निर्माण करते थे | मथुरामें गढ़ी गई मूर्तियाँ और शिल्प लाल चित्तेदार पत्थर की होती थीं जो यहाँ बहुतायत से मिलता है । यद्यपि यहाँकी कला सांची और भरहुतकी देशी कलाके साथ ही साथ कुछ अंशोंमें गांधारकी कलासे भी प्रभावित थी । तो भी मथुराकी कला में पूर्ण मौलिकता है । मूर्तियाँ चौड़े चेहरे, चिपटी नाक स्थूलकायकी विशेषताओंसे गुप्तकाल की मूर्तियोंसे सरलता से पृथकू की जा सकती हैं जिनके गोल चेहरे और नुकीली नाकमें सौन्दर्य भर दिया गया है। गुप्त-कालकी मूर्तियाँ विशेष आकर्षक और प्रभावक हैं । इस कालमें मूर्तिनिर्माणकला अपनी चरम सीमापर पहुँच चुकी थी । कुषाण-कालमें जो प्रभामण्डल अत्यन्त सादे बनाए जाते थे, इस कालमें वे अत्यन्त अलंकृत बनाए जाने लगे थे और उनमें हस्तिनख मणिबन्ध, तथा अनेक बेलबूटे भरे जाते थे । कुषाण युगकी मूर्तियों का सिर प्रायः मुण्डितमस्तक होता था पर गुप्तयुगमें छल्लेदार बालोंकी रचना और भी भली लगती है यह अन्तर मथुरा संग्रहालयके कुषाणकालीन सिर नं० बी ७८ और गुप्तकालीन सिर नं० बी ६९ में तथा कुषाणकालीन मूर्ति नं० बी २, बी ६३ और गुप्तकालीन मूर्ति नं० बी १, बी ६ आदिमें स्पष्ट लक्षित । किया जा सकता है। खुदाईका इतिहास मथुराके कङ्काली टीलेकी खुदाई सर्वप्रथम सन् Jain Education International [ वर्ष ह १८७१ में श्रीकनिंघमने की और इस खुदाई में उन्हें अनेक तीर्थङ्कर मूर्तियाँ - जिनपर कुषाणवंशी प्रतापी सम्राट् कनिष्ककें ५ वें वर्षसे वासुदेवके ह८वें वर्ष तक के लेख खुदे थे - मिलीं । दूसरी खुदाई १८८८-१ में विस्तृतरूपसे डाकूर फ्यूररने की और इसमें उन्होंने ७३७ मूर्तियाँ तथा अन्य शिल्प खोद निकाले । वे सब आज भी लखनऊ संग्रहालय में सुरक्षित हैं । इसके पश्चात् पं० राधाकृष्णजीने भी कङ्काली टीलेकी खुदाई की और अनेक प्रकारकी महत्त्वपूर्ण सामग्री प्राप्त की। इस प्रकार कङ्काली टीला जैन सामग्रीके लिए खदान सिद्ध हुआ है। लखनऊ संग्रहालय इसी सामग्रीसे सजा हुआ है। पीछेकी सामग्री मथुरा संग्रहालय में सुरक्षित है और वहाँ सैकड़ों मूर्तियाँ और लेख विद्यमान हैं। उन्हींमेंसे कुछेकका संक्षिप्त विवेचन यहाँ किया जाएगा । श्रयागपट्ट (क्यू २ ) संग्रहालयकी दरीची नं० २ ( Court B) के दक्षिणी भागमें एक वर्गाकार शिलापट्ट प्रदर्शित है, इसपर एक स्तूप तोरणद्वार और वेदिकाओं सहित बना हुआ है। पट्टपर खुदे हुए लेखसे विदित होता है कि इस प्रकार के शिलापट्टोंको आयागपट्ट कहा जाता था और ये पूजाके काममें लाए जाते थे । यह अनुमान किया जाता है कि उक्त आयागपट्टपर उत्कीर्ण तोरण और वेदिका - मण्डित स्तूप मथुरा के विशाल जैनस्तूपकी प्रतिकृति है जो ईसासे दूसरी शती पूर्व स्थित था । प्रस्तुत आयागपट्टपर एक लेख खुदा हुआ है जिसके अनुसार वृद्ध गरिएका लवणशोभिकाकी पुत्री और श्रमणोंकी श्राविका वसु नामक एक वेश्याने इसे दानमें दिया था । लेखकी लिपि ई० पू० पहली शतीकी है और मूल लेख निम्न प्रकार है:१९. नमो अरहतो वर्धमानस २. ३. रामे गनिका ये लोणशोभिकाये धितु शमणसाविकाये नादाए गणिकाए वासु (यु) आरहातो देविक - ( उ ) ल ४. आयामसभा प्रपा शिलाप (तो) पतिस्ठापिता निगथा For Personal & Private Use Only 1 www.jainelibrary.org
SR No.527259
Book TitleAnekant 1948 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1948
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size14 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy