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________________ मथुरा-संग्रहालयकी महत्त्वपूर्ण जैन पुरातत्त्व-सामग्री (श्रीबालचन्द्र जैन एम० ए०, संग्रहाध्यक्ष 'जैनसंग्रहालय सोनागिर') मथुराका महत्त्व कोई स्थान नहीं रह जाता कि प्राचीनकालमें जैनोंमें पुरातन कालमें मथुरा और उसके आसपास भी स्तूपों और चैत्योंकी पूजाका प्रचलन था। हिन्दू, जैन और बौद्ध तीनों धर्मोकी त्रिवेणी बहती . मथुरा-कला थी । जनतापर तीनों धर्मोके विचारों और मान्यताओं- .. मथुराकी जैनकला बौद्धकलाकी भाँति ही कुषाण का अच्छा प्रभाव था और उनके केन्द्र-स्थानोंकी और गुप्त राजाओंके समयमें क्रमशः विकसित होती स्थितिसे विदित होता है कि उस समय तीनों धर्मोके गई। इन दोनों युगोंकी जैन और बौद्ध मूर्तियों एवं माननेवाले पारस्परिक विद्वेषसे परे थे । वर्तमान अन्य शिल्पके तक्षणमें कोई विशेष अन्तर न था। खुदाईसे यह स्पष्ट ज्ञात हो गया है कि मथुरा केन्द्र सही बात तो यह है कि कला कभी किसी सम्प्रदायआपसी द्वेष और कलहके कारण नष्ट नहीं हुआ था विशेषके नामसे विकसित हुई ही नहीं। इस लिए बल्कि किसी भयङ्कर विदेशी आक्रमणकी बर्बरता जैनधर्म या सम्प्रदायके नामपर कलाका विभाजन और उनकी तहसनहस नीतिका शिकार बनकर ही करना उचित नहीं प्रतीत होता । कलाका विकास यह भूगतवासी बन गया। मथुराकी संस्कृति और कालके अनुसार होता है। और जो मूर्ति या मन्दिर वहाँके पुरातत्त्वको नष्ट करनेवाली जाति हूण थी जो जिस कालमें निर्मित होते हैं उनपर उस कालका अपनी बर्बरता और असंस्कृतपनेके लिए प्रसिद्ध है। प्रभाव अवश्य रहता है चाहे वे जैन हों या बौद्ध या . उनसे भी जो कुछ बचा रहा वह मूर्तिपूजाके विरोधी अन्य कोई । यही कारण है कि जैन और बौद्ध स्तूपोंके मुसलमानोंकी आँखोंसे न बच सका और अन्ततोगत्वा तोरण, वेदिका आदिमें समानता है। मथुराकी वह कला सदाके लिए विलीन हो गई। डाकृर बूलरका मत है:. जैन इतिहासमें मथुराका एक ही स्थान है। "The early art of the Jains did not दिगम्बर सम्प्रदायका तो यह गढ़ था, प्राचीन आगमों differ materially from that of the और सिद्धान्तग्रन्थोंकी भाषा मथुराकी शौरसेनी Buddhists. Indeed art was never प्राकृत ही है; अनेक विहार और श्रमणसंघ मथुरा- communal. Both sects used the same क्षेत्रमें स्वपरकल्याणमें प्रतृवृ थे। प्राचीनतम जैन ornaments, the same artistic motives मूर्तियाँ मथुरासे ही प्राप्त हुई हैं। और जितनी अधिक and the same sacred symbols, diffeसंख्यामें सुन्दर और कलापूर्ण मूर्तियाँ और शिल्प rences occuring chiefly in minor points यहाँके कङ्काली टीलेकी खुदाईमें प्राप्त हुए हैं उतने only. The cause of this agreement is किसी भी अन्य स्थानसे प्राप्त नहीं हुए in all probobility not that adherents प्राप्त लेखों और आयागपट्टोंपर बनी हुई प्रतिकृति- of one sect immitated those of the से यह प्रमाणित हो गया है कि ईसासे दूसरी शती others, but that both drew on the पूर्व मथुरामें एक विशाल जैन स्तूप था जो बौद्ध national art of India and employed स्तूपोंकी भाँति सुन्दर वेदिका. तोरण आदिसे सुसजित the same artists." था। इस विशाल स्तूपके उल्लेखसे अब इसमें शङ्काको Epigraphia Indica Vol.II Page 322. Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org
SR No.527259
Book TitleAnekant 1948 09
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJugalkishor Mukhtar
PublisherJugalkishor Mukhtar
Publication Year1948
Total Pages42
LanguageHindi
ClassificationMagazine, India_Anekant, & India
File Size14 MB
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